मेरी ब्लॉग सूची : INDIAN ASTROLOGY

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

भारतीय ज्योतिष शास्त्र में विभिन्न प्रकार की दशा एवं उनका उपयोग - Different types of conditions and their use in Indian astrology


 जन्म कुण्डली देखने के लिए विभिन्न प्रकार की दशा का उपयोग किया जाता है ।और जिनके आधार पर  फलादेश करने में सटीकता आती है, क्योंकि अलग अलग तरह की दशाएं एक ही तरह के घटनाक्रम को जब दर्शाए तो ही उस घटना से संबंधित शुभ - अशुभ फल प्राप्त होते हैं । 

मुख्य रूप से विंशोंत्तरी दशा , अष्टोत्तरी दशा, कालचक्र दशा एवं योगिनी दशा का प्रचलन आज के समय में प्रचलित  है । इस के इलावा कुछ अन्य विशेष दशाएँ भी प्रचलन में हैं जैसे कि सुख साधनों के लिए सुदशा  , आध्यात्मिक कार्यो के लिए दृग्दशा एवं दुर्भाग्य, बीमारी, दुर्घटना, मृत्यु के लिए शूल दशा का उपयोग किया जाता है । 

 विंशोंत्तरी दशा -  खास कर कलियुग के इस समय में किसी भी कुण्डली पर इस दशा को लगाया जा सकता है , इस लिए आज के समय में हर किसी की जन्म कुण्डली में इस दशा का उपयोग किया जाता है, जिस से सामान्य जीवन के  शुभ - अशुभ फल का निर्धारण हो जाता है कि कब किसी के लिए समय अनुकूल है और कब समय प्रतिकूल  चल रहा है । जीवन के किसी भी विषय से संबंधित शुभ - अशुभ फलादेश इस दशा के माध्यम से किये जाते हैं ।

अष्टोत्तरी दशा - विंशोंत्तरी दशा  चक्र के बाद दूसरी महत्वपूर्ण दशा है अष्टोत्तरी दशा चक्र, यह दशा चक्र विंशोंत्तरी दशा  के समान ही फलादेश करने में सक्षम है । जीवन के सभी तरह के विषय से संबंधित शुभ - अशुभ फलादेश इस दशा चक्र के माध्यम से भी किये जाते हैं , इस दशा को किसी भी जन्म कुण्डली पर लगाने के कारण इस प्रकार बताये गए हैं ।  अगर जातक का जन्म शुक्ल पक्ष के दिनों में दिन के समय का हो या फिर कृष्ण पक्ष के दिनों में रात्रि के समय का हो तो उस जातक की जन्म कुण्डली से संबंधित फलादेश करने के लिए अष्टोत्तरी दशा का उपयोग किया जाता है । 

कालचक्र दशा -  पाराशरी ज्योतिष यानी वैदिक ज्योतिष में विंशोंत्तरी दशा तथा अष्टोत्तरी दशा का उपयोग किया जाता है ।  जबकि जैमिनी ज्योतिष में कालचक्र दशा का उपयोग किया जाता है । इस दशा को जैमिनी चर दशा या राशि क्रम दशा भी कहा जाता है जिस में नवग्रहों की बजाए दशा राशियों के नाम पर जैसे कि मेष राशि महादशा , वृषभ राशि महादशा इस तरह 12 राशि एवं उनमें राशियों के ही अन्तर्दशा  क्रम अनुसार चलते हैं । इस तरह वर्तमान में चल रही किसी पर राशि दशा की शुभता अशुभता का निर्धारण उस राशि को देखने वाले ग्रहो की शुभ - अशुभता पर निर्भर करता है , जैसे कि नैसर्गिक अशुभ ग्रह ( मंगल, शनि, राहु, केतु ) किसी राशि पर दृष्टि दे रहे हो तो उस राशि की दशा अशुभ फल देती है , जबकि शुभ ग्रहों के दृष्टि प्रभाव में होने वाली राशि की दशा शुभ फल दशा के दौरान देती है । 

सुदशा - इस दशा का उपयोग भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति के लिए किया जाता है , जैसे कि अगर कोई घर खरीदना चाहता, कोई वाहन खरीदना चाहता हो , स्त्री सुख प्राप्ति जैसे विषयों में सफलता एवं असफलता का विचार इस दशा से किया जाता है । 

दृग्दशा  - इस दशा का उपयोग कुछ खास कार्य जैसे कि किसी की आध्यात्मिक तरक्की , कार्य सिद्धि , मन्त्र सिद्धि में सफलता के लिए विचार इस दशा चक्र से किया जाता है । जैसे कि अगर कोई आध्यात्मिक विषयो से जुड़ा हो, ज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखता हो , विशेष फल प्राप्ति के लिए पूजा पाठ में लगा हुआ हो तो उस में सफलता या असफलता का विचार इस दशा से किया जाता है । 

शूल दशा  - इस दशा का उपयोग कुछ खास स्थिति जैसे कि अगर किसी पर समय सही ना चल रहा हो, कोई किसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित हो, या फिर कोई धन से कष्ट में हो या फिर किसी पर विंशोंत्तरी दशा अनुसार मारक ग्रह की महादशा चल रही हो तो इस दशा का उपयोग किया जाता है । शूल दशा से किसी के दुर्भाग्य, अशुभ फल , रोग से पीड़ित या उस से बचाव आदि का विचार किया जाता है ।



शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

संकट से हनुमान छुड़ावे - Hanuman get rid of crisis

 तुलसीदासजी कहते हैं- संकट ते हनुमान छुड़ावें" शनि को हम संकट कहते हैं, एक बार हनुमानजी पहाड़ की तलहटी में बैठे थे तभी शनि महाराज हनुमानजी के सिर पर आ गये, हनुमानजी ने सिर खुजाया लगता है कोई कीड़ा आ गया, हनुमानजी ने पूछा तू है कौन? शनिदेव ने कहां- मैं शनि हूँ, मैं संकट हूँ, हनुमानजी ने कहा मेरे पास क्यो आये हो? शनि बोले मैं अब आपके सिर पर निवास करूँगा।

हनुमानजी बोले - अरे भले आदमी, मैंने ही तुझे रावण के बंधन से छुड़वाया था और मेरे ही सिर पर आ गये, बोले हाँ क्यो छुड़ाया था आपने, इसका फल तो आपको भोगना पडे़गा, अच्छा कितने दिन रहना है? शनि बोला साढ़े सात साल और अच्छी खातिरदारी हो गयी तो ढाई साल और, हनुमानजी ने कहा भले आदमी किसी और के पास जाओं।
मैं भला श्री रामजी का सेवक हूँ , सुबह से शाम तक सेवा में लगा रहता हूँ, मुश्किल पड़ जाएगी, तुम भी दुःख भोगेगे और मुझे भी परेशान करोगे, शनिदेव ने कहा मैं तो नही जाऊंगा, हनुमानजी बोले कोई बात नही तुम ऐसे नही मानोगे, हनुमानजी ने एक बहुत बड़ा पत्थर उठाया और अपने सिर पर रखा, पत्थर शनिदेव के ऊपर आ गया, शनि महाराज बोले यह क्या कर रहे हो? बोले माँ ने कहा था कि चटनी बनाने के लिए एक बटना ले आना वह ले जा रहा हूँ, हनुमानजी ने जैसे ही पत्थर को उठाकर मचका दिया तो शनि चीं बोलने लगा, दूसरी बार किया तो बोले क्या करते हो? बोले चिन्ता मत करों, शनिदेव बोले- छोड़ो-छोड़ो, हनुमानजी बोले नहीं अभी तो साढ़े सात मिनट भी नहीं हुये है, तुम्हें तो साढ़े सात साल रहना है।
जब दो-तीन मचके ओर दिये तो शनिदेव तिलमिला गये, शनिदेव ने कहा भैय्या मेरे ऊपर कृपा करो, बोले ऐसी कृपा नही करूँगा, बोले वरदान देकर जाओं, शनि का ही दिन था, हनुमानजी ने कहा कि तुम मेरे भक्तो को सताना बंद करोगे, तब शनि ने कहा कि हनुमानजी के जो भी भक्त शनिवार को आपका स्मरण करेगा आपके चालीसा का पाठ करेगा मैं उसके यहाँ नही, बल्कि उसके पडोसी के वहाँ भी कभी नही जाऊंगा, उसका संकट दूर हो जायेगा।
फिर शनिदेव ने कहा कि हनुमानजी एक कृपा आप भी मुझ पर कर दीजिये, हनुमानजी बोले क्या? शनिदेव बोले- आपने इतनी ज्यादा मेरी हड्डियां चरमरा दी हैं, इसलिये थोड़ी तेल मालिश हो जाये तो बड़ी कृपा हो जायें, हनुमानजी ने कहा कि ठीक है मैं अपने भक्तो को कहता हूँ कि शनिवार के दिन जो शनिदेव को तेल चढ़ायेंगा उसके संकट मैं स्वयं दूर करूँगा।
दूसरा संकट क्या है? त्रिताप ही संकट है, दैविक, दैहिक तथा भौतिक ताप यही संकट है और इसकी मुक्ति का साधन क्या है? केवल भगवान् का सुमिरन, "राम राज बैठें त्रैलोका, हरषित भये गये सब सोका" रामराज कोई शासन की व्यवस्था का नाम नही है, रामराज मानव के स्वभाव की अवस्था का नाम है, समाज की दिव्य अवस्था का नाम है।
रामराज्य की अवस्था क्या है? "सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती" यह रामराज्य की अवस्था है, व्यवस्था कैसी भी हो अगर, व्यक्तियों की और समाज की यह अवस्था रहेगी तो शासन में कोई भी बैठो राज्य राम का ही माना जायेगा,राम मर्यादा है, धर्म है, सत्य है, शील है, सेवा है, समर्पण है, राम किसी व्यक्तित्व का नाम नही है, राम वृत्ति का नाम है, स्वरूप का नाम राम नहीं है बल्कि स्वभाव का नाम राम है, इस स्वभाव के जो भी होंगे वे सब राम ही कहलायेंगे, वेद का, धर्म की मर्यादा का पालन हो, स्वधर्म का पालन हो, यही रामराज्य है।
स्वधर्म का अर्थ है जिस-जिस का जो-जो धर्म है, पिता का पुत्र के प्रति धर्म, पुत्र का पिता के प्रति धर्म, स्वामी का धर्म, सेवक का धर्म, राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, पति का धर्म, पत्नी का धर्म, शिक्षक का धर्म, शिष्य का धर्म।
यानी अपने-अपने कर्तव्य का पालन, जैसे सड़क पर अपनी-अपनी लाईन में यदि वाहन चलेंगे तो किसी प्रकार की टकराहट नही होगी, संघर्ष नही होगा और जब आप लाईन तोड़ देंगे जैसे मर्यादा की रेखा जानकीजी ने तोड़ दी थी, आखिर कितने संकट में फँस गयी, कितना बड़ा युद्ध करना पड़ा जानकीजी को छुड़ाने के लियें।
जरा सी मर्यादा का उल्लंघन जीवन को कितने बड़े संकट में फँसा सकता है, जो रामराज्य में रहेगा हनुमानजी उसके पास संकट आने ही नही देंगे, क्योंकि रामराज्य के मुख्य पहरेदार तो श्रीहनुमानजी महाराज हैं, तीनों कालों का संकट हनुमानजी से दूर रहता है, संकट होता है- शोक, मोह और भय से, भूतकाल का भय ऐसा क्यों कर दिया, ऐसा कर देता तो मोह होता है।
हनुमानजी सब कालों में विधमान हैं, "चारों जुग प्रताप तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा" हनुमानजी तो अमर हैं।
चारों युगों में हैं सम्पूर्ण संकट जहाँ छूट जाते हैं शोक, मोह, भय वह है भगवान् श्री रामजी की कथा, कथा में हनुमानजी रहते हैं, अगर वृत्तियाँ न छूटे तो हनुमानजी छुड़ा देंगे, बिल्कुल मानस के अंत में पार्वतीजी ने प्रमाणित किया है, "सुनि भुसुंडि के बचन सुहाये, हरषित खगपति पंख फुलाये" तीनों संकट अगर दूर चले जाते हैं, या छोड़ देते हैं, मनुष्य को तो वह श्रीराम की कृपा मिल जाती है, और उस कृपा से मोह का नाश होता है।
बिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद, होय न दृढ़ अनुराग।।
भगवत कथा, सत्संग यह मोह का नाश करती है, संत-मिलन संत-दर्शन शोक को दूर करता है "तोहि दैखि वेग शीतल भई छाती" जैसे हनुमानजी मिले तो जानकीजी का ह्रदय शान्त हो गया, शीतल हो गया, हनुमानजी के प्रति श्रद्धा रखियें, श्रद्धा से भय का नाश होता है, आपके मन में यदि भगवान् के प्रति श्रद्धा है तो आप कभी किसी से भयभीत नही होंगे।



बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

शनि ग्रह की साढ़ेसाती / ढैय्या की संपूर्ण जानकारी लीजिये -

साढ़ेसाती, ढैय्या एवं शनि दशा के प्रभाव कब कष्टदायी होती है।

साढ़ेसाती क्या? राजयोग भी देता है ।

शनि का प्रभाव जैमिनी ऋषि के अनुसार कलियुग में शनि का सबसे ज्यादा प्रभाव है। शनि ग्रह स्थिरता का प्रतीक है। कार्यकुशलता, गंभीर विचार, ध्यान और विमर्श शनि के प्रभाव में आते हैं। यह शांत, सहनशील, स्थिर और दृढ़ प्रवृत्ति का होता है। उल्लास, आनंद, प्रसन्नता में गुण स्वभाव में नहीं है। शनि को यम भी कहते हैं। शनि की वस्तुएं नीलम, कोयला, लोहा, काली दालें, सरसों का तेल, नीला कप़डा, चम़डा आदि है। यह कहा जा सकता है कि चन्द्र मन का कारक है तथा शनि बल या दबाव डालता है।
मेष राशि जहां नीच राशि है, वहीं शत्रु राशि भी और तुला जहां मित्र राशि है वहीं उच्च राशि भी है। शनि वात रोग, मृत्यु, चोर-डकैती मामला, मुकद्दमा, फांसी, जेल, तस्करी, जुआ, जासूसी, शत्रुता, लाभ-हानि, दिवालिया, राजदंड, त्याग पत्र, राज्य भंग, राज्य लाभ या व्यापार-व्यवसाय का कारक माना जाता है।
शनि की दृष्टि शनि जिस राशि में स्थित होता है उससे तृतीय, सप्तम और दशम राशि पर पूर्ण दृष्टि रखता है। ऐसा भी माना जाता है, कि शनि जहाँ बैठता है, वहां तो हानि नहीं करता, पर जहाँ-२ उसकी दृष्टि पड़ती है, वहां बहुत हानि होती है (हालाँकि वास्तविकता में यह भी देखना पड़ता है, कि बैठने/दृष्टि का घर शनि के मित्र ग्रह का है, या शत्रु ग्रह, आदि)
साढ़ेसाती और ढैय्या कब और इनका जीवन पर प्रभाव प्रभाव ?
विश्व के 25 प्रतिशत व्यक्ति शनि की साढ़ेसाती और 16.66 प्रतिशत व्यक्ति इसकी ढैया के प्रभाव में सदैव रहते हैं। तो क्या 41.66 प्रतिशत व्यक्ति हमेशा शनि की साढ़ेसाती या ढैया के प्रभाव से ग्रस्त रहते हैं ?
क्या उन लोगों पर जो न शनि की साढ़ेसाती और न ही उनकी ढैया के प्रभाव में होते हैं कोई विशेष संकट नहीं आते ?
शनि की साढ़ेसाती तब शुरू होती है जब शनि गोचर में जन्म राशि से 12वें घर में भ्रमण करने लगता है, और तब तक रहती है जब वह जन्म राशि से द्वितीय भाव में स्थित रहता है। वास्तव में शनि जन्म राशि से 45 अंश से 45 अंश बाद तक जब भ्रमण करता है तब उसकी साढ़ेसाती होती है।
इसी प्रकार चंद्र राशि से चतुर्थ या अष्टम भाव में शनि के जाने पर ढैया आरंभ होती है। सूक्ष्म नियम के अनुसार जन्म राशि से चतुर्थ भाव के आरंभ से पंचम भाव की संधि तक और अष्टम भाव के आरंभ से नवम भाव की संधि तक शनि की ढैया होनी चाहिए।
नोट - साढ़ेसाती और ढैय्या हमेशा राशि - यानि कि जिस राशि में जन्म कुण्डली में चन्द्रमा स्थित होता है, उस से देखी जाती हैं ।
भ्रम शनि की साढ़े साती की शुरूआत को लेकर जहां कई तरह की विचारधाराएं मिलती हैं वहीं इसके प्रभाव को लेकर भी हमारे मन में भ्रम और कपोल कल्पित विचारों का ताना बाना बुना रहता है। जन-मानस में इसके बारे में बहुत सारे भ्रम भी व्याप्त हैं। यह किसी भी प्राणी को अकारण दंडित नहीं करता है। लोग यह सोच कर ही घबरा जाते हैं कि शनि की साढ़े साती शुरू हो गयी तो कष्ट और परेशानियों की शुरूआत होने वाली है। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं जो लोग ऐसा सोचते हैं वे अकारण ही भयभीत होते हैंवास्तव में अलग अलग राशियों के व्यक्तियों पर शनि का प्रभाव अलग अलग होता है।
लक्षण और उपाय
लक्षण जिस प्रकार हर पीला दिखने वाला धातु सोना नहीं होता उस प्रकार जीवन में आने वाले सभी कष्ट का कारण शनि नहीं होता। आपके जीवन में सफलता और खुशियों में बाधा आ रही है तो इसका कारण अन्य ग्रहों का कमज़ोर या नीच स्थिति में होना भी हो सकता है। आप अकारण ही शनिदेव को दोष न दें फिर शनि के प्रभाव में कमी लाने हेतु आवश्यक उपाय करें।
ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या आने के कुछ लक्षण हैं जिनसे आप खुद जान सकते हैं कि आपके लिए शनि शुभ हैं या प्रतिकूल। जैसे घर, दीवार का कोई भाग अचानक गिर जाता है। घर के निर्माण या मरम्मत में व्यक्ति को काफी धन खर्च करना पड़ता है। घर के अधिकांश सदस्य बीमार रहते हैं, घर में अचानक अग लग जाती है, आपको बार-बार अपमानित होना पड़ता है। घर की महिलाएं अक्सर बीमार रहती हैं, एक परेशानी से आप जैसे ही निकलते हैं दूसरी परेशानी सिर उठाए खड़ी रहती है। व्यापार एवं व्यवसाय में असफलता और नुकसान होता है। घर में मांसाहार एवं मादक पदार्थों के प्रति लोगों का रूझान काफी बढ़ जाता है। घर में आये दिन कलह होने लगता है। अकारण ही आपके ऊपर कलंक या इल्ज़ाम लगता है। आंख व कान में तकलीफ महसूस होती है एवं आपके घर से चप्पल जूते गायब होने लगते हैं, या जल्दी-जल्दी टूटने लगते हैं। इसके अलावा अकारण ही लंबी दूरी की यात्राएं करनी पड़ती है। नौकरी एवं व्यवसाय में परेशानी आने लगती है। मेहनत करने पर भी व्यक्ति को पदोन्नति नहीं मिल पाती है। अधिकारियों से संबंध बिगड़ने लगते हैं और नौकरी छूट जाती है। व्यक्ति को अनचाही जगह पर तबादला मिलता है। व्यक्ति को अपने पद से नीचे के पद पर जाकर काम करना पड़ता है। आर्थिक परेशानी बढ़ जाती है। व्यापार करने वाले को घाटा उठाना पड़ता है। आजीविका में परेशानी आने के कारण व्यक्ति मानसिक तौर पर उलझन में रहता है। इसका स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति को जमीन एवं मकान से जुड़े विवादों का सामना करना पड़ता है।
सगे-संबंधियों एवं रिश्तेदारों में किसी पैतृक संपत्ति को लेकर आपसी मनमुटाव और मतभेद बढ़ जाता है। शनि महाराज भाइयों के बीच दूरियां भी बढ़ा देते हैं। शनि का प्रकोप जब किसी व्यक्ति पर होने वाला होता है तो कई प्रकार के संकेत शनि देते हैं। इनमें एक संकेत है व्यक्ति का अचानक झूठ बोलना बढ़ जाना।
उपाय शनिदेव भगवान शंकर के भक्त हैं, भगवान शंकर की जिनके ऊपर कृपा होती है उन्हें शनि हानि नहीं पहुंचाते अत: नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा व अराधना करनी चाहिए। पीपल में सभी देवताओं का निवास कहा गया है इस हेतु पीपल को आर्घ देने अर्थात जल देने से शनि देव प्रसन्न होते हैं। अनुराधा नक्षत्र में जिस दिन अमावस्या हो और शनिवार का दिन हो उस दिन आप तेल, तिल सहित विधि पूर्वक पीपल वृक्ष की पूजा करें तो शनि के कोप से आपको मुक्ति मिलती है। शनिदेव की प्रसन्नता हेतु शनि स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए।
शनि के कोप से बचने हेतु आप हनुमान जी की आराधाना कर सकते हैं, क्योंकि शास्त्रों में हनुमान जी को रूद्रावतार कहा गया है। आप साढ़े साते से मुक्ति हेतु शनिवार को बंदरों को केला व चना खिला सकते हैं। नाव के तले में लगी कील और काले घोड़े का नाल भी शनि की साढ़े साती के कुप्रभाव से आपको बचा सकता है अगर आप इनकी अंगूठी बनवाकर धारण करते हैं। लोहे से बने बर्तन, काला कपड़ा, सरसों का तेल, चमड़े के जूते, काला सुरमा, काले चने, काले तिल, उड़द की साबूत दाल ये तमाम चीज़ें शनि ग्रह से सम्बन्धित वस्तुएं हैं, शनिवार के दिन इन वस्तुओं का दान करने से एवं काले वस्त्र एवं काली वस्तुओं का उपयोग करने से शनि की प्रसन्नता प्राप्त होती है।
साढ़े साती के कष्टकारी प्रभाव से बचने हेतु आप चाहें तो इन उपायों से भी लाभ ले सकते हैं ।
शनिवार के दिन शनि देव के नाम पर व्रत रख सकते हैं।
नारियल अथवा बादाम शनिवार के दिन सर से 11 बार उत्तर कर जल में प्रवाहित कर सकते हैं।
नियमित 108 बार शनि की तात्रिक मंत्र का जाप कर सकते हैं स्वयं शनि देव इस स्तोत्र को महिमा मंडित करते हैं।
महामृत्युंजय मंत्र काल का अंत करने वाला है आप शनि की दशा से बचने हेतु किसी योग्य पंडित से महामृत्युंजय मंत्र द्वारा शिव का अभिषेक कराएं तो शनि के फंदे से आप मुक्त हो जाएंगे।
किसी शनिवार की शाम जूते का दान करें।
साढ़े साती शुभ
शनि की ढईया और साढ़े साती का नाम सुनकर बड़े बड़े पराक्रमी और धनवानों के चेहरे की रंगत उड़ जाती है। लोगों के मन में बैठे शनि देव के भय का कई ठग ज्योतिषी नाज़ायज लाभ उठाते हैं। विद्वान ज्योतिषशास्त्रियों की मानें तो शनि सभी व्यक्ति के लिए कष्टकारी नहीं होते हैं। शनि की दशा के दौरान बहुत से लोगों को अपेक्षा से बढ़कर लाभ-सम्मान व वैभव की प्राप्ति होती है। कुछ लोगों को शनि की इस दशा के दौरान काफी परेशानी एवं कष्ट का सामना करनाहोता है। देखा जाय तो शनि केवल कष्ट ही नहीं देते बल्कि शुभ और लाभ भीप्रदान करते हैं। हम विषय की गहराई में जाकर देखें तो शनि का प्रभाव सभी व्यक्ति परउनकी राशि कुण्डली में वर्तमान विभिन्न तत्वों व कर्म पर निर्भर करता है. अत: शनि के प्रभाव को लेकर आपको भयग्रस्त होने की जरूरत नहीं है। आइये हम देखे कि शनि किसी के लिए कष्टकर और किसी के लिए सुखकारी तो किसी को मिश्रित फल देने वाला कैसे होता है।
शनि की स्थिति का आंकलन भी जरूरी होता है। अगर आपका लग्न वृष,मिथुन, कन्या, तुला, मकर अथवा कुम्भ है, तो शनि आपको नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि आपको उनसे लाभ व सहयोग मिलता है. उपरोक्त लग्न वालों केअलावा जो भी लग्न हैं उनमें जन्म लेने वाले व्यक्ति को शनि के कुप्रभाव कासामना करना पड़ता है। ज्योतिर्विद बताते हैं कि साढ़े साती का वास्तविकप्रभाव जानने के लिए चन्द्र राशि के अनुसार शनि की स्थिति ज्ञात करने केसाथ लग्न कुण्डली में चन्द्र की स्थिति का आंकलन भी जरूरी होता है।
यह ज्योतिष का गूढ़ विषय है जिसका उत्तर कुण्डली में ढूंढा जा सकता है। साढ़े साती केप्रभाव के लिए कुण्डली में लग्न व लग्नेश की स्थिति के साथ ही शनि और चन्द्र की स्थिति पर भी विचार किया जाता है।


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

अग्निवास का मुहूर्त जानें –

कोई भी अनुष्ठान के पश्चात हवन करने का शास्त्रीय विधान है और हवन करने हेतु भी कुछ नियम बताये गए हैं जिसका अनुसरण करना अति – आवश्यक है , अन्यथा अनुष्ठान का दुष्परिणाम भी आपको झेलना पड़ सकता है ।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है हवन के दिन ‘अग्नि के वास ‘ का पता करना ताकि हवन का शुभ फल आपको प्राप्त हो सके ।
जिस दिन आपको होम करना हो, उस दिन की तिथि और वार की संख्या को जोड़कर 1 जमा (1 जोड़ ) करें फिर कुल जोड़ को 4 से भाग देवें- अर्थात् शुक्ल प्रतिपदा से वर्तमान तिथि तक गिनें तथा एक जोड़े , रविवारसे दिन गिने पुनः दोनों को जोड़कर चार का भाग दें।
-यदि शेष शुन्य (0) अथवा 3 बचे, तो अग्नि का वास पृथ्वी पर होगा और इस दिन होम करना कल्याणकारक होता है ।
-यदि शेष 2 बचे तो अग्नि का वास पाताल में होता है और इस दिन होम करने से धन का नुक्सान होता है ।
-यदि शेष 1बचे तो आकाश में अग्नि का वास होगा, इसमें होम करने से आयु का क्षय होता है ।
अतः यह आवश्यक है की होम में अग्नि के वास का पता करने के बाद ही हवन करें ।
शास्त्रीय विधान के अनुसार वार की गणना रविवार से तथा तिथि की गणना शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा से करनी चाहिए तदुपरांत गृह के ‘मुख-आहुति-चक्र ‘ का विचार करना चाहिए ।
उदाहरण----
मान लो आज हम कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि मे चल रहे है तो ।
शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक 15 तिथि तो कुल योग आया 15 + 4 + 1 = 20
आज कौन सा दिन हैं और इस दिन को रविवार से गिने । मानलो आज बुधवार हैं तो रविवार से गिनने पर बुधवार 3 आया । कुल योग 20 + 3 = 23/4 कर दे तो शेष कितना बचा । 4 – 23 / 5
– 20 । 3 को शेष कहा जायेगा । परिणाम इस प्रकार से होंगे ।
• शेष 0 तो अग्नि का निवास पृथ्वी पर ।
• शेष 1 तो अग्नि का निवास आकाश मे ।
• शेष 2 तो अग्नि का निवास पाताल मे ।
• शेष 3 बचे तो पृथ्वी पर माने ।
पृथ्वी पर अग्नि वास सुख कारी होता हैं । आकाश मे प्राणनाश और पाताल मे धन नाश होता हैं । मतलब हमें वह तिथि चुनना हैं जिस तिथि मे शेष 3 बचे ।
वह तिथि ही लाभकारी होगी । प्रज्वलित अग्नि के आकार को देख कर कई नाम रखे गए हैं । पर अभी उनसे हमें सरोकार नही हैं । इस तरह से अग्नि वास का पता हमें लगाना हैं।
भू रुदन :-
हर महीने की अंतिम घडी, वर्ष का अंतिम् दिन, अमावस्या, हर मंगल वार को भू रुदन होता हैं । अतः इस काल को शुभ कार्य भी नही लिया जाना चाहिए ।
यहाँ महीने का मतलब हिंदी मास से हैं और एक घडी मतलब 24 मिनिट हैं । अगर ज्यादा गुणा न किया जाए तो मास का अंतिम दिन को इस आहुति कार्य के लिए न ले।
भू रजस्वला :-
इस का बहुत ध्यान रखना चाहिए ।यह तो हर व्यक्ति जानता हैं की मकरसंक्रांति लगभग कब पड़ती हैं । अगर इसका लेना देना मकर राशि से हैं तो इसका सीधा सा तात्पर्य यह हैं की हर महीने एक सूर्य संक्रांति पड़ती ही हैं और यह एक हर महीने पड़ने वाला विशिष्ट साधनात्मक महूर्त होता हैं ।
तो जिस भारतीय महीने आपने आहुति का मन बनाया हैं ठीक उसी महीने पड़ने वाली सूर्य संक्रांति से (हर लोकलपंचांग मे यह दिया होता हैं । लगभग 15 तारीख के आस पास यह दिन होता हैं । मतलब सूर्य संक्रांति को एक मान कर गिना जाए तो 1, 5, 10, 11, 16, 18, 19 दिन भू रजस्वला होती हैं ।
भू शयन :-
आपको सूर्य संक्रांति समझ मे आ गयी हैं तो किसी भी महीने की सूर्य संक्रांती से 5, 7, 9, 15, 21 या 24 वे दिन को भू शयन माना
जाया हैं ।
सूर्य जिस नक्षत्र पर हो उस नक्षत्र से आगे गिनने पर 5, 7,9, 12, 19, 26 वे नक्षत्र मे पृथ्वी शयन होता हैं । इस तरह से यह भी
काल सही नही हैं ।
अब समय हैं यह जानने का कि भू हास्य क्या है ?
भू हास्य :- तिथि मे पंचमी ,दशमी ,पूर्णिमा ।
वार मे – गुरु वार ।
नक्षत्र मे – पुष्य, श्रवण मे पृथ्वी हसती हैं ।
अतः इन दिनों का प्रयोगकिया जाना चाहिए ।
गुरु और शुक्र अस्त :- यह दोनों ग्रह कब अस्त होते हैं और कब उदित ।
आप लोकल पंचांग मे बहुत ही आसानी से देख सकते हैं और इसका निर्धारण कर सकते हैं । अस्त होने का सीधा सा मतलब हैं की ये ग्रह सूर्य के कुछ ज्यादा समीप हो गए और अब अपना असर नही दे पा रहे हैं ।
क्यूंकी इन दोनों ग्रहो का प्रत्येक शुभ कार्य से सीधा लेना देना हैं । अतः इनके अस्त होने पर शुभ कार्य नही किये जाते हैं और इन दोनों के उदय रहने की अवस्था मे शुभ कार्य किये
जाना चाहिये ।
आहुति कैसे दी जाए :-
• आहुति देते समय अपने सीधे हाँथ के मध्यमा और
का सहारा ले कर उसे प्रज्ज्वलित अग्नि मे ही छोड़ा जाए ।
• आहुति हमेशा झुक कर डालना चाहिए वह भी इसतरह से की पूरी आहुति अग्नि मे ही गिरे ।
• जब आहुति डाली जा रही हो तभी सभी एक साथ स्वाहा शब्द बोले ।
(यह एक शब्द नही बल्कि एक देवी का नाम है )
• जिन मंत्रो के अंतमे स्वाहा शब्द पहले से हैं उसमे फिर से पुनःस्वाहा शब्द न बोले यह ध्यान रहे।
वार :- रविवार और गुरुवार सामन्यतः सभी यज्ञों के लिए श्रेष्ठ दिवस हैं । शुकल पक्ष मे यज्ञ आदि कार्य कहीं ज्यादा उचित हैं ।
किस पक्ष मे शुभ कार्य न करे :-
ग्रंथ कार कहते हैं की जिस पक्ष मे दो क्षय तिथि हो मतलब वह पक्षः 15 दिन का न हो कर 13 दिन का ही हो जायेगा उस पक्ष मे समस्त शुभ कार्य वर्जित हैं ।
ठीक इसी तरह अधि़क मास या मल मास मे भी यज्ञ कार्य वर्जित हैं ।
किस समय हवन आदि कार्य करें :- सामान्यतः आपको इसके लिए पंचांग देखना होगा । उसमे वह दिन कितने समय का हैं । उस दिन मान के नाम से बताया जाता हैं ।
उस समय के तीन भाग कर दे और प्रथम भाग का उपयोग यज्ञ अदि कार्यों के लिए किया जाना चाहिए । साधारण तौर से यही अर्थ हुआ की की दोपहर से पहले यज्ञ आदि कार्य प्रारंभ हो जाना चहिये ।
हाँ आप राहु काल आदि का ध्यान रख सकते हैं और रखना ही चहिये क्योंकि यह समय बेहद अशुभ माना जाता हैं ।
यज्ञ कुंड के प्रकार :-
यज्ञ कुंड मुख्यत: आठ प्रकार के होते हैं और सभी का प्रयोजन अलग अलग होताहैं ।
1. योनी कुंड – योग्य पुत्र प्राप्ति हेतु ।
2. अर्ध चंद्राकार कुंड – परिवार मे सुख शांति हेतु । पर पतिपत्नी दोनों को एक साथ आहुति देना पड़ती हैं ।
3. त्रिकोण कुंड – शत्रुओं पर पूर्ण विजय हेतु ।
4. वृत्त कुंड – जन कल्याण और देश मे शांति हेतु ।
5. सम अष्टास्त्र कुंड – रोग निवारण हेतु ।
6. सम षडास्त्र कुंड – शत्रुओ मे लड़ाई झगडे करवाने हेतु ।
7. चतुष् कोणा स्त्र कुंड – सर्व कार्य की सिद्धि हेतु ।
8. पदम कुंड – तीव्रतम प्रयोग और मारण प्रयोगों से बचने हेतु ।
तो आप समझ ही गए होंगे की सामान्यतः हमें
चतुर्वर्ग के आकार के इस कुंड का ही प्रयोग करना हैं ।
ध्यान रखने योग्य बाते :-
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अबतक आपने शास्त्रीय बाते समझने का
प्रयास किया यह बहुत जरुरी हैं । क्योंकि इसके बिना सरल बाते पर आप गंभीरता से विचार नही कर सकते । सरल विधान का यह मतलब कदापि नही की आप गंभीर बातों को ह्र्द्यगम ना करें ।
पर जप के बाद कितना और कैसे हवन किया जाता हैं ? कितने लोग और किस प्रकार के लोग कीआप सहायता ले सकते हैं ?
कितना हवन किया जाना हैं ? हवन करते समय किन किन बातों का ध्यान रखना हैं ? क्या कोई और सरल उपाय भी जिसमे हवन ही न करना पड़े ?
किस दिशा की ओर मुंह करके बैठना हैं ? किस प्रकार की अग्नि का आह्वान करना हैं ? किस प्रकार की हवन सामग्री का उपयोग करना हैं ?
दीपक कैसे और किस चीज का लगाना हैं ? कुछ और आवश्यक सावधानी ? आदि बातों के साथ अब कुछ बेहद सरल बातों को अब हम देखेगे ।
जब शास्त्रीय गूढता युक्त तथ्य हमने समंझ लिए हैं तो अब सरल बातों और किस तरह से करना हैं पर भी कुछ विषद चर्चा की आवश्यकता हैं ।
कितना हवन किया जाए?
शास्त्रीय नियम
तो दसवे हिस्सा का हैं ।
इसका सीधा मतलब की एक अनुष्ठान मे
1,25,000 जप या 1250 माला मंत्र जप अनिवार्य हैं और इसका दशवा हिस्सा होगा 1250/10 =125 माला हवन मतलब लगभग 12,500 आहुति ।
(यदि एक माला मे 108 की जगह सिर्फ100 गिनती ही माने तो) और एक आहुति मे मानलो 15 second लगे तब कुल 12,500 *
15 = 187500 second मतलब 3125 minute मतलब 52 घंटे लगभग।
तो किसी एक व्यक्ति के लिए इतनी देर आहुति दे पाना क्या संभव हैं ?
तो क्या अन्य व्यक्ति की सहायता ली जा सकती हैं? तो इसका
उतर
हैं हाँ । पर वह सभी शक्ति मंत्रो से दीक्षित हो या अपने ही गुरु भाई बहिन हो तो अति उत्तम हैं ।
जब यह भी न संभव हो तो गुरुदेव के श्री चरणों मे अपनी असमर्थता व्यक्त कर मन ही मन
उनसे आशीर्वाद लेकर घर के सदस्यों की सहायता ले सकते हैं ।
तो क्या कोई और उपाय नही हैं ? यदि दसवां हिस्सा संभव न हो तो शतांश हिस्सा भी हवन
किया जा सकता हैं ।
मतलब 1250/100 = 12.5 माला मतलब लगभग 1250 आहुति = लगने वाला समय = 5/6 घंटे ।यह एक साधक के लिए संभव हैं ।
पर यह भी हवन भी यदि संभव ना हो तो ? कतिपय साधक किराए के मकान मे या फ्लेट मे रहते हैं वहां आहुति देना भी संभव नही हैं तब क्या ?
गुरुदेव जी ने यह भी विधान सामने रखा की साधक यदि कुल जप संख्या का एक चौथाई हिस्सा जप और कर देता हैं संकल्प ले कर की मैं दसवाँ हिस्सा हवन नही कर पा रहा हूँ ।
इसलिए यह मंत्र जप कर रहा हूँ तो यह भी संभव हैं । पर इस केस मे शतांश जप नही चलेगा इस बात का ध्यान रखे ।
श्त्रुक स्त्रुव :- ये आहुति डालने के काम मे आते हैं । स्त्रुक 36 अंगुल लंबा और स्त्रुव 24 अंगुल लंबा होना चाहिए ।
इसका मुंह आठ अंगुल और कंठ एक अंगुल का होना चाहिए । ये दोनों स्वर्ण रजत पीपल आमपलाश की लकड़ी के बनाये जा सकते हैं ।
हवन किस चीज का किया जाना चाहिये ?
• शांति कर्म मे पीपल के पत्ते, गिलोय, घी का ।
• पुष्टि क्रम मे बेलपत्र चमेली के पुष्प घी ।
• स्त्री प्राप्ति के लिए कमल ।
• दरिद्रयता दूर करने के लिये दही और घी का ।
• आकर्षण कार्यों मे पलाश के पुष्प या सेंधा नमक से ।
• वशीकरण मे चमेली के फूल से ।
• उच्चाटन मे कपास के बीज से ।
• मारण कार्य मे धतूरे के बीज से हवन किया जा ना चाहिए ।
दिशा क्या होना चाहिए ?
साधारण रूप से जो हवन कर रहे हैं वह कुंड के पश्चिम मे बैठे और उनका मुंह पूर्व
दिशा की ओर होना चाहिये । यह भी विशद व्याख्या चाहता हैं । यदि षट्कर्म किये
जा रहे हो तो ;
• शांती और पुष्टि कर्म मे पूर्व दिशा की ओर हवन कर्ता का मुंह रहे ।
• आकर्षण मे उत्तर की ओर हवन कर्ता मुंह रहे और यज्ञ कुंड वायु कोण मे हो ।
• विद्वेषण मे नैरित्य दिशा की ओर मुंह रहे यज्ञ कुंड वायु कोण मे रहे ।
• उच्चाटन मे अग्नि कोण मे मुंह रहे यज्ञ कुंड वायु कोण मे रहे ।
• मारण कार्यों मे – दक्षिण दिशा मे मुंह और दक्षिण दिशा मे हवन हुंड हो ।
किस प्रकार के हवन कुंड का उपयोग किया जाना चाहिए ?
• शांति कार्यों मे स्वर्ण, रजत या ताबे का हवन कुंड होना चाहिए ।
• अभिचार कार्यों मे लोहे का हवन कुंड होना चाहिए।
• उच्चाटन मे मिटटी का हवन कुंड ।
• मोहन कार्यों मे पीतल का हवन कुंड ।
• और ताबे का हवन कुंड मे प्रत्येक कार्य मे उपयोग की या जा सकता हैं ।
. 9. किस नाम की अग्नि का आवाहन किया जाना चाहिए ?
• शांति कार्यों मे वरदा नाम की अग्नि का आवाहन किया जाना चहिये ।
• पुर्णाहुति मे मृडा नाम की ।
• पुष्टि कार्योंमे बल द नाम की अग्नि का ।
• अभिचार कार्योंमे क्रोध नाम की अग्नि का ।
• वशीकरण मे कामद नाम की अग्नि का आहवान किया जाना चहिये ।
कुछ ध्यान योग बाते :-
• नीम या बबुल की लकड़ी का प्रयोग ना करें ।
• यदि शमशान मे हवन कर रहे हैं तो उसकी कोई भी चीजे अपने घर मे न लाये ।
• दीपक को बाजोट पर पहले से बनाये हुए चन्दन के त्रिकोण पर ही रखे ।
• दीपक मे या तो गाय के घी का या तिल का तेल का प्रयोग करें ।
• घी का दीपक देवता के दक्षिण भाग मे और तिल का तेल का दीपक देवता के बाए ओर लगाया जाना चाहिए ।
• शुद्ध भारतीय वस्त्र पहिन कर हवन करें ।
• यज्ञ कुंड के ईशान कोण मे कलश की स्थापना करें ।
• कलश के चारो ओर स्वास्तिक का चित्र अंकित करें ।
• हवन कुंड को सजाया हुआ होना चाहिए ।