किसी भी शुभ कार्य को सकुशल एवं शुभ समय व मुहूर्त में सम्पन्न कराना उसके कुशल क्षेम के लिए अत्यन्त आवश्यक होता है !
1. शुभ वर्ष ! 2. शुभ अयन ! 3. शुभ ऋतु ! 4. शुभ माह ! 5. शुभ पक्ष ! 6. शुभ नक्षत्र ! 7. शुभ दिन ! 8. शुभ तिथि ! 9. शुभ योग ! 10. शुभ करण ! 11. शुभ लग्न !
12. शुभ मुहूर्त !
.1 - सर्वप्रथम हमें उस वर्ष की के पंचाग से देखकर, राजा, महामंत्री, वर्षफल, मौसम, एवं शुभता की दृष्टि से उपयुक्तता देखते हैं !
2 - यदि हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम अगले वर्ष की प्रतीक्षा करें, तब अयन का विचार करते हैं ।
1.उत्तरायण, 2. दक्षिणायण !
3.यदि अयन शुभ होने के लिए छः माह रुकने का भी समय नहीं है तब हम शुभ ऋतु पर विचार कर मुहूर्त निकालते हैं !
4.ऋतु के बाद हम किसी शुभ माह में शुभ कार्य करने का प्रयास करते हैं, निषेध मास जैसे - पौष माह, चैत्र माह, अधिकमास, क्षयमास, देवशयन के मास,खरमास इत्यादि !
5. कार्यक्रम शुक्ल पक्ष में किया जाय या कृष्ण पक्ष में !
6. नक्षत्र की शुभता पर विचार करते हैं !
7. शुभ दिन का भी विचार करते हैं !
8. कौन सी तिथि है उसकी भी शुभता पर गौर करना पड़ता है !
9. शुभ योग का विचार करना आवश्यक होता है !
10. हमें करण की शुभता पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है, क्योंकि भद्रा, शकुनि, नाग, किस्तुघ्न एवं चतुष्पद आदि करण अशुभ होते हैं !
11. अपने अनुकूल लग्न में ही कार्य को सम्पन्न करना चाहिए ! प्रतिदिन 12 लग्न पड़ती है, एक लग्न लगभग दो घण्टे की होती है, इनके नाम बारह राशियों के नाम पर होते हैं ! जो राशि पूर्वी क्षितिज पर उदय हो रही होती है, उस समय वही लग्न होती है !
12. एक मुहूर्त लगभग दो घड़ी अर्थात 48 मिनट का होता है ! दिन रात कुल 24 घण्टों में कुल 30 मुहूर्त होते हैं, जिसमें शुभ अशुभ एवं मध्यम किस्म के मुहूर्त भी होते हैं, इसके अतिरिक्त चौघड़िया मुहूर्त भी आठ दिन के व आठ रात के होते हैं ! किसी तात्कालिक शुभ कार्य को सम्पन्न करने हेतु हम चौघड़िया मुहूर्त का भी प्रयोग कर सकते हैं !
. शुभ नक्षत्र —
मूल, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, हस्त, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, स्वाति, मघा, रोहिणी शुभ नक्षत्र हैं परन्तु इन्हे निर्वेध होना आवश्यक है !
" रोहिण्युत्तर रेवत्यो मूलं स्वाती मृगो मघा !
अनुराधा च हस्तश्च विवाहे मंगलप्रदा !!"..... (शीघ्रबोध) !!
माह - ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष, आषाढ़ शुभ माह हैं !
"परन्तु अधिमाह या मलमास में विवाह वर्जित है !"
शुभ दिवस — सोमवार, बुद्धवार, गुरुवार, शुक्रवार !
शुभ तिथियाँ — 1 - नंदा_तिथियाँ - 1, 6, 11.(शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा को छोड़कर ) !
2 - भद्रा तिथियाँ - 2, 7, 12.
3 - पूर्णा तिथियाँ - 5, 10, 15 (अमावस्या को छोड़कर) !
4 - जया तिथियाँ - 3, 8, 13.
विशेष परिस्थितियों में जया तिथियों का भी प्रयोग पूजा करके कर सकते हैं !
5 - रिक्ता तिथियों में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए !"
ग्रहों का बलाबल - विवाह में कन्या के लिए गुरुबल, वर के लिए सूर्यबल और दोनों के लिए चंद्रबल का विचार किया जाता है !
गुरुबल विचार — बृहस्पति कन्या की राशि से नवम, पंचम, एकादश, द्वितीय और सप्तम राशि में शुभ होता है ! दशम, तृतीय, षष्ठ और प्रथम राशि में दान देने से शुभ और चतुर्थ, अष्टम, द्वादश राशि में अशुभ होता है !
सूर्यबल विचार — सूर्य वर की राशि से तृतीय, षष्ठ, दशम, एकादश राशि में शुभ होता है ! प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम और नवम राशि में दान देने से शुभ और चतुर्थ, अष्टम, द्वादश राशि में अशुभ होता है !
चंद्रबल विचार —चंद्रमा, वर और कन्या की राशि में तीसरा, छठा, सातवां, दसवां, ग्यारहवां शुभ होता है ! पहला, दूसरा, पांचवां, नौवां, दान देने से शुभ और चौथा, आठवां, बारहवां अशुभ होता है !
शुभ लग्न —तुला, मिथुन, कन्या, वृष और धनु लग्न शुभ हैं ! अन्य मध्यम होते हैं !
लग्न शुद्धि —
लग्न से बारहवें शनि, दसवें मंगल, तीसरे शुक्र, लग्न में चंद्रमा और क्रूर ग्रह अच्छे नहीं होते हैं ! लग्नेश, शुक्र व चंद्रमा, छठे और आठवें में शुभ नहीं होते हैं ! लग्नेश और सौम्य ग्रह आठवें में अच्छे नहीं होते हैं और सातवें में कोई भी ग्रह शुभ नहीं होता है !
वर्जित समय —1 - गुरु अस्त का समय, गुरु जब सूर्य के दोनो ओर 15 अंश से नजदीक होते हैं अस्त हो जाते हैं यह शुभ कार्य हेतु वर्जित होता है ! गुरु के बाल, वृद्ध के तीन तीन दिन अस्त से पहले और अस्त के बाद के समय का भी परित्याग करना चाहिए !
2 - शुक्र अस्त की अवधि एवं अस्त के प्रारम्भ व बाद के समय में तीन तीन दिन बाल वृद्ध की अवधि का भी त्याग करना चाहिए !
3 - संक्रान्ति परिवर्तन की तिथि का परित्याग ! सूर्य के राशि परिवर्तन के दिन को संक्रान्ति कहते हैं ! सूर्य के कमजोर अंश में होने व परिवर्तनशील होने के कारण यह दिन भी त्याज्य होता है !
4 - अमावस्या व शुक्ल प्रतिपदा व रिक्ता तिथियों की अशुभता को दृष्टिगत रखते हुए इनका भी त्याग कर देना चाहिए !
5 - सूर्य ग्रहण के प्रारम्भ से बारह घण्टे पहले से ग्रहण समाप्त होने के छः घण्टे बाद तक का ग्रहण व सूतक के समय सहित का त्याग ! वैसे सिद्धांततः जिस माह में सूर्य ग्रहण पड़ा हो उस माह में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए !
6 - चन्द्र ग्रहण के बारह घण्टे पूर्व से ग्रहण समाप्त होने के छः घण्टे बाद तक ग्रहण व सूतक के समय का त्याग ! वैसे सिद्धांततः जिस माह में चन्द्र ग्रहण पड़ा हो उस माह में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए !
7 - जब सूर्य धनु राशि या मीन राशि में गोचर कर रहे हो या गुरु सिंह राशि में गोचर कर रहे हों, ऐसे खरमास का त्याग !
गुरु के सिंह राशि में रहने की अवधि एक वर्ष होती है, अतः प्रारम्भ के पाँच चरण का त्याग अवश्य कर देना चाहिए ! शेष चार चरण में शुभ मुहूर्त देखकर शुभ कार्य किये जा सकते हैं !
8 - देवशयनी एकादशी से देवोत्थानी एकादशी की पूरी अवधि चौमासा का त्याग !
9 - होलिकाष्टक की आठ तिथियों का त्याग !
10 - अधिकमास, क्षयमास का त्याग !
11 - क्षय तिथि व वृद्धि तिथि का त्याग !
12 - क्रूर ग्रहों (रवि, मंगल, शनि ) के दिनों का त्याग !
13 - अशुभ योगों का त्याग !
14 - अशुभ करण - शकुनि, नाग, चतुष्पाद, किस्तुघ्न एवं विष्टि या भद्रा का त्याग !
15 - राहुकाल, गुलिक व यमघण्टक मुहूर्त, वारवेला, कालवेला, भद्रा का त्याग !
16 - अशुभ चौघड़िया उद्वेग, रोग, चर, काल वारवेला, कालवेला का त्याग !
इन सभी उपायों के बाद ही आपको शुभ मुहूर्त की गणना करने के पश्चात अपने शुभ कार्य का सही मुहूर्त आदि निर्धारित करना चाहिए और उनका सही समय व मुहूर्त आने पर सही निर्धारित समय पर शुभ कार्य को सम्पन्न करा लेना चाहिए !