मेरी ब्लॉग सूची : INDIAN ASTROLOGY

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

भारतीय ज्योतिष का सुझाव - Indian astrology tips


1 - जिन लोगों की कुण्डली में सूर्य नीच राशि में हो या राहु से पीड़ित हो तो ऐसे व्यक्तियों में आत्मविश्वास की बहुत कमी बनी रहती है ऐसे लोगो के लिए "आदित्य हृदय स्तोत्र" का पाठ करना अमृत तुल्य कार्य करता है और आत्मविश्वास में वृद्धि करता है।
2 - यदि मंगल कुण्डली में आठवे भाव में स्थित हो या कुण्डली में मंगल राहु का योग हो तो ऐसे व्यक्तियों को वाहन चलते समय बहुत सावधानी रखनी चाहिए अष्टम मंगल दुर्घटनाएं अधिक कराता है।
3 - यदि कुण्डली में केतु की दशा के समय जीवन में बाधाये अधिक आ रही हों तो गणेश जी की उपासना करें लाभ मिलेगा।
4 - यदि कुण्डली में मंगल नीच राशि (कर्क) में हो, राहु के साथ हो या पाप भाव (6,8,12) में होने से पीड़ित हो तो ऐसे में व्यक्ति को लेंड प्रोपर्टी या जमीन जायदात से जुड़े कार्य नहीं करने चाहिए हानि होती है।
5 - यदि कुण्डली में चन्द नीचस्थ या पाप प्रभाव में होने से मानसिक अस्थिरता और तनाव की स्थिति रहती हो तो चाँदी की एक ठोस गोली का लॉकेट सफ़ेद धागे के साथ गले में धारण करें लाभ होगा।
6 - यदि संतान सुख में कमी हो या संतान आज्ञाकारी ना हो तो ॐ बृं बृहस्पतये नमः का जाप करे सकारात्मक परिवर्तन होगा।
7 - राहु की दशा में दुष्परिणाम मिल रहे हों तो सफ़ेद चन्दन की माला गले में धारण करें लाभ होगा।
8 - जिन लोगों की कुण्डली में शनि स्व उच्च राशि (मकर,कुम्भ,तुला) में हो या शुभ स्थान में बली हो तो ऐसे व्यक्तियों के लिए तकनीकी कार्य, मसीनों, पुर्जों, लोहे, स्टील और केमिकल प्रोडक्ट्स का कार्य लाभकारी होता है।
9 - यदि जीवन में बार बार दुर्घटना या एक्सीडेंट की स्थिति बनती हो तो हनुमान चालीस और संकटमोचन हनुमानाष्टक का रोज पाठ करें लाभ होगा।
10 - जिन लोगों की कुण्डली में लाभेश (ग्यारहवे भाव का स्वामी) छटे, आठवे, बारहवे भाव में होकर कमजोर हो, नीच राशि में में हो या अन्य प्रकार पीड़ित हो तो ऐसे लोगों को बिजनेस के क्षेत्र में नहीं जाना चाइये हानि की संभावनाएं अधिक होती हैं।
11 - यदि जीवन में यश और प्रसिद्धि की कमी हो तो सूर्य की उपासना करें सकारात्मक परिवर्तन होंगे।
12 - यदि कुण्डली में चंद्रमा स्व उच्च राशि (कर्क,वृष) में होकर शुभ स्थान में बलि हो या दशम भाव में बली होकर स्थित हो और लाभेश शुभ स्थिति में हो तो ऐसे व्यक्ति को कन्फेक्शनरी, डेयरी प्रोडक्ट और पानी से जुड़े कार्य करना लाभदायक होता है।
13 - यदि कुण्डली में शुक्र पीड़ित होने से आर्थिक पक्ष संघर्षपूर्ण हो तो प्रत्येक शुक्रवार को गाय को खीर खिलाएं लाभ होगा।
14 - यदि कुण्डली के किसी भाव में कोई पाप योग (जैसे गुरुचांडाल योग, ग्रहण योग, अंगारक योग) बन रहा हो, छटे भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में हो या कुंडली में मंगल बहुत पीड़ित हो तो ऐसे व्यक्ति को किसी भी प्रकार का लोन या कर्ज लेने से बचना चाहिए ऐसे में कर्ज या लोन का रिपेमेंट करने में बहुत बाधायें आती हैं।
15 यदि शीत रोग (नजला, जुखाम, कफ, खांसी) अधिक परेशान करते हों तो चन्द्रमाँ के मन्त्र ॐ सोम सोमाय नमः का नियमित रूप से जाप करें लाभ होगा।
16 - यदि शिक्षा में बार बार बाधायें आती हों तो बृहस्पति मन्त्र ॐ बृं बृहस्पतये नमः का नियमित रूप से जाप करें सकारात्मक परिवर्तन होंगे।
17 - यदि मन में निराशा का भाव रहता हो तो नियमित रूप "आदित्य हृदय स्तोत्र" का पाठ करें अवश्य लाभ होगा।
18 - जिन जातकों की कुण्डली में बुध स्व उच्च राशि (मिथुन,कन्या) में होकर बली हो या शुभ स्थानों में होकर बली स्थिती में हो तो ऐसे व्यक्तियों को गणनात्मक और वाणिज्य से जुड़े विषयों जैसे अकाउंटिंग, सीए., टैली, और कंप्यूटर फील्ड में अच्छी साफलता मिलती है।
19 - यदि बच्चा रात को सोते हुए डर जाता हो तो सोते समय उसके सिराने पर या तकिये के नीचे "हनुमान चालीसा" रख दें सकारात्मक परिवर्तन होंगे।
20 - जोड़ों के दर्द की अमास्या यदि हमेशा बनी रहती हो तो शनि मन्त्र - ॐ शं शनैश्चराय नमः का नियमित रूप से जाप करें लाभ होगा।
21 - यदि विवाह में विलम्ब हो तो पुरुष जातक शुक्र मन्त्र - ॐ शुं शुक्राय नमः तथा स्त्री जातक मंगल मन्त्र - ॐ अं अंगारकाय नमः का नियमित जाप करें लाभ होगा।
22 - यदि शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के कारण अधिक बाधाएं आ रही हों तो नियमित रूप से शनिवार को पीपल पर सरसों के तेल का दिया जलाएं और गरीब व्यक्तियों को भोजन कराएं लाभ होगा।
23 - जिन जातकों की कुण्डली में बृहस्पति और सूर्य स्व उच्च राशि या शुभ स्थानों में होकर मजबूत स्थिति में हों तो ऐसे जातकों के लिए मैनेजमेंट का फील्ड करियर के लिए अच्छा होता है।
24 - यदि कुण्डली में कालसर्प योग के कारण जीवन में संघर्ष की अधिकता हो तो पक्षियों और कुत्तों को प्रतिदिन भोजन दें लाभ होगा।
25 - यदि कुण्डली में बृहस्पति की दशा चल रही हो तो बृहस्पतिवार को विष्णु भगवान् को गेंदे के फूल अर्पित करें शुभ परिणाम होंगे।



गुरुवार, 18 मार्च 2021

इन्दु लग्न क्या है? What is Indu Lagna?


भारतीय ज्योतिष ग्रंथों में किसी भी जातक के धन संपत्ति एवं ऐश्वर्य संबंधी योग जानने के लिए “धन लग्न” अर्थात “इंदु लग्न” के विषय में बताया गया है ।
इस इंदु लग्न को जानने के लिए एक सूत्र का उल्लेख किया गया है हमने इस सूत्र को आधार बनाकर इस लेख में व्यक्ति विशेष की धनयोगो को जानने का प्रयास किया है ।
"धन लग्न" अथवा "इन्दु लग्न" निकालने के लिए ग्रहों को प्राप्त नैसर्गिक कला का प्रयोग किया जाता है । राहू केतू चूंकि छाया ग्रह माने जाते हैं इसलिए इस इन्दु लग्न की गणना मे उन्हे नहीं लेते हैं |
सर्वप्रथम ग्रहों को प्राप्त नैसर्गिक रश्मि को निम्न सारणी से समझते हैं ।
सूर्य 30 कला,
चंद्रमा 16 कला,
मंगल 6 कला,
बुध 8 कला,
बृहस्पति 10 कला,
शुक्र 12 कला,
शनि 1 कला ।
1 - सर्वप्रथम लग्न से नवम राशि के स्वामी एवं चंद्रमा से नवम राशि के स्वामी को प्राप्त रश्मि संख्या को जोड़े फिर उस संख्या को 12 से भाग दें चूंकि कुंडली मे केवल 12 भाव होते हैं यदि योग 12 से कम आता हैं तो 12 से भाग देने की ज़रूरत नहीं होती ।
2 - अब जो संख्या आए चंद्र लग्न से उतने आगे गिनने पर जो राशि आएगी वह धन लग्न होगी । चन्द्र को इन्दु भी कहते हैं तथा चन्द्र लग्न से गिनने के कारण ही इसे इन्दु लग्न कहा जाता हैं |
धन की स्थिति का आकलन करने के लिए निम्न बिंदु विचारणीय होंगे |
1 - इन्दु लग्न में यदि एक शुभ ग्रह हो और वह पाप प्रभाव से मुक्त हो तो व्यक्ति करोड़पति बनता है |
2 - इंदु लग्न में ऊंच का पाप ग्रह हो तो व्यक्ति धनवान व नीच का पाप ग्रह हो तो दरिद्र होता है |
3 - इन्दु लग्न का स्वामी यदि इंदु लग्न को देख रहा हो तो व्यक्ति धनवान होता है |
4 - इंदु लग्न का कुंडली के धनेश और लाभेश से किसी भी प्रकार का संबंध व्यक्ति को धनवान बनाता है
5 - जब कोई ग्रह इन्दु लग्न में प्रभाव डालते हो या इन्दु लग्न से दूसरे/ग्यारहवें भाव में हो तो व्यक्ति विशेष निश्चित ही धनवान होता है |
6 - यदि धन लग्न में नैसर्गिक शुभ ग्रह अधिक होंगे तो व्यक्ति बहुत धनी होगा |
7 - यदि एक ही शुभ ग्रह हो परंतु शुभ अथवा अशुभ ग्रह से भी दृष्ट हो तो व्यक्ति धनी तो होगा परंतु पहले की स्थिति की तुलना में कम |
8 - यदि धन लग्न में सिर्फ पाप ग्रह सूर्य शनि और मंगल हो तो व्यक्ति के पास पर्याप्त धन होता है |
9 - यदि धन लग्न में अशुभ ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो जीवन के प्रथम भाग में धन सामान्य होगा परंतु दूसरे भाग में धन बढ़ेगा |
10 - धन लग्न से केंद्र त्रिकोण में स्थित शुभ ग्रह की दशा में व्यक्ति धन कमाएगा इसके विपरीत लग्न से 3,6,8,12 भाव की स्थिति ग्रह राशि स्वामी की दशा में धन का नाश होता है ।




सोमवार, 15 मार्च 2021

अशुभ ग्रह जातक को अपने प्रभाव में कब लेते हैं .? When inauspicious planets take the native under their influence.?

 प्रत्येक जातक की कुण्डली में ग्रहों की स्थिति शुभ-अशुभ रहती हैं। साथ ही ग्रहों की दशा-महादशा भी शुभ-अशुभ फल देती है। शनि की साढ़ेसाती भी जातक को शुभ-अशुभ फल देती है। परंतु इन सबके अलावा नवग्रह जातक के कर्म-कुकर्म के आधार पर भी शुभ-अशुभ फल देते है।  

सूर्य-जब जातक किसी भी प्रकार का टैक्स चुराता है एवं किसी भी जीव की आत्मा को कष्ट देता है। तब सूर्य अशुभ फल देता है।

चंद्र-जब जातक सम्मानजनक स्त्रियों को कष्ट देता हैं। जैसे- माता, नानी, दादी, सास एवं इनके समान वाली स्त्रियों को कष्ट देता है तब चंद्र अशुभ फल देता है। धोखे से किसी से कोई वस्तु लेने पर भी चंद्रमा अशुभ फल देता है।

मंगल-जब जातक अपने भाई से झगड़ा करें, भाई के साथ धोखा करें। अपनी पत्नी के भाई का अपमान करें, तो भी मंगल अशुभ फल देता है।

बुध-जब जातक अपनी बहन, बेटी अथवा बुआ को कष्ट देता है, साली एवं मौसी को कष्ट देता है। जब जातक हिजड़े को कष्ट देता है, तो भी बुध अशुभ फल देता है।

गुरु-जब जातक पिता, दादा, नाना को कष्ट देता है अथवा इनके समान पद वाले व्यक्ति को कष्ट देता है। साधु-संतों को कष्ट देने से भी गुरु अशुभ फल देता है।

शुक्र-जब जातक जीवनसाथी को कष्ट देता है। घर में गंदे एवं फटे वस्त्र रखने एवं पहनने पर भी शुक्र अशुभ फल देता है।

शनि-जब जातक ताऊ, चाचा को कष्ट देता है, मजदूर की पूरी मजदूरी नहीं देता है। घर या दुकान के नौकरों को गाली देता है। शराब, मांस खाने पर भी शनि अशुभ फल देता है। कुछ लोग मकान या दुकान किराए से लेते फिर बाद में खाली नहीं करते या खाली करने के लिए पैसे मंगाते है, तो शनि अशुभ फल देता है।

राहु-जब जातक बड़े भाई को कष्ट देता है या अपमान करता है। ननिहाल पक्ष का अपमान करने पर एवं सपेरे का दिल दुखाने पर भी राहु कष्ट देता है।

केतु-जब जातक भतीजे, भांजे को कष्ट देता है या उनका हक छीनता है। कुत्ते को मारने या किसी के द्वारा मरवाने पर, मंदिर की ध्वजा तोड़ने पर केतु अशुभ फल देता है। किसी की झूठी गवाही देने पर भी राहु-केतु अशुभ फल देते हैं।

अत: नवग्रहों का अनुकूल फल पाने के लिए मनुष्य को अपना जीवन व्यवस्थित जीना चाहिए, किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए। न ही किसी के साथ छल-कपट करना चाहिए।



रविवार, 14 मार्च 2021

जन्म पत्रिका जीवित या मृत जातक की है /Birth magazine is of living or dead

 भारतीय ज्योतिष के अन्तर्गत  कुण्डली में ग्रहों के स्थिति को देख कर ये ज्ञात करना कि जातक जिन्दा है या मर चूका है -

नियम - जन्म लग्न, अष्टम स्थान की राशि और प्रश्न लग्न इन तीनो की संख्या को जोड़ कर जन्म कुण्डली के अष्टमेश की राशि संख्या से गुणा कर के लग्नेश की राशि संख्या से भाग देने पर विषम अंक - 1,3,5,7,9,11 शेष रहे तो जीवित की और सम अंक - 2,4,6,8,10,12 शेष रहे तो मृतक की जन्म पत्रिका होती है।

उदहारण - प्रश्न लग्न तुला, जन्म लग्न मीन और अष्टमेश की राशि 9, लग्नेश की राशि 
7 (प्रश्न लग्न) + 12 (जन्म लग्न) + 7 ( अष्टम स्थान की राशि ) = 26 × 9 ( अष्टमेश की राशि ) = 234 ÷ 5 ( लग्नेश की राशि ) = 46 लब्ध 4 शेष ।
अतएव मृतक की जन्म पत्रिका है ।

नोट - ये विधि श्री नेमीचंद शास्त्री जी द्वारा लिखी हुई पुस्तक " भारतीय ज्योतिष" में बताई गई है ।



शनिवार, 6 मार्च 2021

भारतीय ज्योतिष में विदेश यात्रा के प्रमुख योग - Major astrology of foreign travel in Indian astrology


जन्मकुंडली के द्वादश भावों में से प्रमुखतया, अष्टम भाव, नवम, सप्तम, बारहवां भाव विदेश यात्रा से संबंधित है। तृतीय भाव से भी लघु यात्राओं की जानकारी ली जाती है। अष्टम भाव समुद्री यात्रा का प्रतीक है। सप्तम तथा नवम भाव लंबी विदेश यात्राएं, विदेशों में व्यापार, व्यवसाय एवं प्रवास के द्योतक हैं। इसके अतिरिक्त लग्न तथा लग्नेश की शुभाशुभ स्थिति भी विदेश यात्रा संबंधी योगों को प्रभावित करती है।
मेष लग्न -
1- मेष लग्न हो तथा लग्नेश तथा सप्तमेश जन्म कुंडली के किसी भी भाव में एक साथ हों या उनमें परस्पर दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
2- मेष लग्न में शनि अष्टम भाव में स्थित हो तथा द्वादशेश बलवान हो तो जातक कई बार विदेश यात्राएं करता है।
3- मेष लग्न हो व लग्नेश तथा भाग्येश अपने-अपने स्थानों में हों या उनमें स्थान परिवर्तन योग बन रहा हो तो विदेश यात्रा होती है।
4- मेष लग्न हो तथा छठे, अष्टम या द्वादश स्थान में कहीं भी शनि हो या शनि की दृष्टि इन भावों पर हो तो विदेश यात्रा का योग होता है।
5- मेष लग्न में अष्टम भाव में बैठा शनि जातक को स्थान से दूर ले जाता है तथा बार-बार विदेश यात्राएं करवाता है। उदाहरण कुंडलियों में सैफ अली खान व अभिषेक बच्चन की कुंडलियों में यही स्थिति है।
वृषभ लग्न -
1- वृष लग्न में सूर्य तथा चंद्रमा द्वादश भाव में हो तो जातक विदेश यात्रा करता है तथा विदेश में ही काम-धंधा करता है।
2- वृष लग्न हो तथा शुक्र केंद्र में हो और नवमेश नवम भाव में हो तो विदेश यात्रा का योग होता है।
3- वृष लग्न हो तथा शनि अष्टम भाव में स्थित हो तो जातक बार-बार विदेश जाता है और विदेश यात्राएं होती रहती हैं।
4- वृष लग्न हो व लग्नेश तथा नवम भाव का स्वामी, मेष, कर्क, तुला या मकर राशि में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
5- वृष लग्न में भाग्य स्थान या तृतीय स्थान में मंगल राहु के साथ स्थित हो तो जातक सैनिक के रूप में विदेश यात्राएं करता है। उदाहरण कुंडली में लता मंगेशकर की यही स्थिति है-
6- वृष लग्न में राहु लग्न, दशम या द्वादश में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। लता मंगेशकर की कुंडली में राहु द्वादश भाव में स्थित है। गायन के सिलसिले में इन्होंने कई विदेश यात्राएं की हैं।
मिथुन लग्न -
1- मिथुन लग्न हो, मंगल व लग्नेश दसवें भाव में स्थित हो, चंद्रमा व लग्नेश शनि द्वारा दृष्ट न हो तो ऐसे योग वाला जातक विदेश यात्रा करता है।
2- मिथुन लग्न हो और लग्नेश तथा नवमेश का स्थान परिवर्तन योग हो तो विदेश यात्रा योग बनता है।
3- मिथुन लग्न हो, शनि वक्री होकर लग्न में बैठा हो तो कई बार विदेश यात्राएं होती हैं।
4- मिथुन लग्न हो तथा लग्नेश व द्वादशेश में परस्पर स्थान परिवर्तन हो व अष्टम व नवम भाव बलवान हो तो विदेश यात्रा होती है। यदि लग्न में राहु अथवा केतु अनुकूल स्थिति में हों और नवम भाव तथा द्वादश स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
कर्क लग्न -
1- कर्क लग्न हो और लग्नेश व चतुर्थेश बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक विदेश यात्रा करता है।
2- कर्क लग्न में चंद्रमा नवम भाव में हो और नवमेश लग्न में स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है।
3- यदि लग्नेश, भाग्येश और द्वादशेश कर्क, वृश्चिक व मीन राशियों में स्थित हो, तो विदेश यात्रा का योग होता है।
4- यदि लग्नेश नवम भाव में स्थित हो और चतुर्थेश छठे, आठवें या द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्राएं होती हैं।
5- यदि लग्नेश बारहवें स्थान में हो या द्वादशेश लग्न में हो तो काफी संघर्ष के बाद विदेश यात्रा होती है।
6- कर्क लग्न में लग्नेश व द्वादशेश की किसी भी भाव में युति हो तो विदेश यात्राएं होती हैं।
सिंह लग्न -
1- सिंह लग्न में गुरु, चंद्र 3, 6, 8 या 12वें भाव में हो तो विदेश यात्रा के योग हैं।
2- लग्नेश जहां बैठा हो उससे द्वादश भाव में स्थित ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
3- सिंह लग्न में द्वादश भाव में कर्क का चंद्रमा स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 4- सिंह लग्न हो तथा मंगल और चंद्रमा की युति द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्रा होती है।
5- यदि सिंह लग्न में लग्न स्थान में सूर्य बैठा हो व नवम व द्वादश भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
कन्या लग्न -
1- यदि कन्या लग्न में सूर्य स्थित हो व नवम व द्वादश भाव शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो विदेश यात्रा योग बनता है।
2- यदि सूर्य अष्टम स्थान में स्थित हो तो जातक दूसरे देशों की यात्राएं करता है।
3- यदि लग्नेश, भाग्येश और द्वादशेश का परस्पर संबंध बने तो जातक को जीवन में विदेश यात्रा के कई अवसर मिलते हैं।
4- कन्या लग्न में बुध और शुक्र का स्थान परिवर्तन विदेश यात्रा का योग बनाता है।
5- द्वितीय भाव में शनि अपनी उच्च राशि में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
तुला लग्न -
1- तुला लग्न में नवमेश बुध उच्च का होकर बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित हो, राहु से प्रभावित हो तो राहु की दशा अंतर्दशा में विदेश यात्रा होती है।
2- यदि चतुर्थेश व नवमेश का परस्पर संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
3- यदि नवमेश या दशमेश का परस्पर संबंध या युति या परस्पर दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
4- चतुर्थ स्थान में मंगल व दशम स्थान में गुरु उच्च का होकर स्थित हो।
5- यदि लग्न में शुक्र व सप्तम में चंद्रमा हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है। उदाहरण कुंडली में टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की यही स्थिति है।
वृश्चिक लग्न -
1- वृश्चिक लग्न में पंचम भाव में अकेला बुध हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो शीघ्र ही विदेश यात्रा होती है।
2- वृश्चिक लग्न में चंद्रमा लग्न में हो, मंगल नवम स्थान में स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
3- यदि सप्तमेश शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर द्वादश स्थान में स्थित हो तो जातक विवाह के बाद विदेश यात्रा करता है।
4- यदि वृश्चिक लग्न में शुक्र अष्टम स्थान में हो या नवम स्थान में गुरु चंद्रमा की युति हो तो विदेश यात्रा का योग होता है।
5- वृश्चिक लग्न में लग्नेश सप्तम भाव में स्थित हो व शुभ ग्रहों से युक्त हो या दृष्टि संबंध हो तो कई बार विदेश यात्रा होती है व जातक विदेश में ही बस जाता है।
धनु लग्न -
1- धनु लग्न में अष्टम स्थान में कर्क राशि का चंद्रमा हो तो जातक कई बाद विदेश यात्रा करता है।
2- धनु लग्न में द्वादश स्थान में मंगल, शनि आदि पाप ग्रह बैठे हों तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
3- धनु लग्न में नवमेश नवम भाव में स्थित हो, बलवान हो व चतुर्थेश से दृष्टि संबंध बनाता हो, युत हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
4- अष्टम भाव में चंद्रमा, गुरु की युति, नवमेश नवम भाव में हो तो विदेश यात्रा का प्रबल योग बनता है।
5- धनु लग्न में बुध और शुक्र की महादशा अक्सर विदेश यात्रा करवाती है।
मकर लग्न -
1- मकर लग्न में सप्तमेश, अष्टमेश, नवमेश या द्वादशेश के साथ राहु या केतु की युति हो जाए तो विदेश गमन होता है।
2- मकर लग्न हो, चतुर्थ और दशम भाव में चर राशि हो और इनमें से किसी भी स्थान में शनि स्थित हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
3- लाभेश और अष्टमेश की युति एकादश स्थान में हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
4- नवमेश बलवान हो तो विदेश यात्रा होती है।
5- शनि चंद्रमा की युति किसी भी स्थान में हो या दोनों में दृष्टि संबंध हो तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
6- सूर्य अष्टम में स्थित हो तो विदेश यात्राएं होती हैं।
कुम्भ लग्न -
1- कुंभ लग्न में नवमेश व लग्नेश का राशि परिवर्तन विदेश यात्रा कराता है।
2- भाग्येश द्वादश भाव में उच्च का होकर स्थित हो तो विदेश यात्रा होती है। 3- दशम स्थान में सूर्य व मंगल की युति विदेश यात्रा का योग बनाता है।
4- नवम या द्वादश या लग्न या नवम के स्वामियों का स्थान परिवर्तन विदेश यात्रा करवाता है।
5- कुंभ लग्न में तृतीय स्थान, नवम स्थान व द्वादश स्थान का परस्पर संबंध विदेश यात्रा का योग करवाता है।
मीन लग्न -
1- लग्नेश गुरु नवम भाव में स्थित हो व चतुर्थेश बुध छठे, आठवें या द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक कई बाद विदेश गमन करता है।
2- पंचमेश, द्वितीयेश व नवमेश की लाभ (एकादश) भाव में युति विदेश यात्रा का योग बनाता है।
3- द्वादश भाव में मंगल, शनि आदि पाप ग्रह हों तो विदेश यात्रा का योग बनता है।
4- यदि शुक्र चंद्रमा से छठे, आठवें या बारहवें स्थान में स्थित हो तो विदेश गमन योग बनता है।
5- मीन लग्न में लग्नेश नवम भाव में स्थित हो व चतुर्थेश छठे, आठवें या द्वादश भाव में हो तो विदेश यात्रा का प्रबल योग बनता है।
6- लग्नस्थ चंद्रमा व दशम भाव में शुक्र हो तो जातक कई देशों की यात्रा करता है।


मंगलवार, 2 मार्च 2021

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अचूक सूत्र - Surefire formulas of Indian astrology

जब गोचर में शनि ग्रह धनु, मकर, मीन व कन्या राशियों में गुजरता है तो भयंकर अकाल रक्त सम्बन्धी विचित्र रोग होते हैं।

स्त्री की कुंडली में यदि चन्द्र वृष कन्या या सिहं राशी में स्थित हो तो स्त्री के कम पुत्र होते हैं "।
जन्म लग्न में चन्द्र व शुक्र हो तो स्त्री क्रोधिनी परन्तु सुखी होती है "।
किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष सोमवार ,बुध या गुरूवार को शपथ ले तो उसे प्रजा एवं राष्ट्राध्यक्ष के लिए शुभ माना जाता है"।।
सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ ,अष्टम,या द्वादश भाव में हो और नीच या अस्त हो तो जातक के विवाह में बाधा आती है"
चन्द्र से सम्बंधित चार विभिन्न योग बनते हैं जब कोई ग्रह चन्द्र से 10वें 7वें, 4थे, ओर पहले हो तो क्रमश:उत्तम,मध्यम, अधम ओर अधमाधम योग बनता है। यदि इनमें अंतिम योग बनता हो तो कुंडली के अन्य योग कमजोर और निष्फल हो जाते हैं"!!
जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए.
जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है।
जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है.
कोई भी ग्रह पहले नवाँशा में होने से जातक को एक प्रगतिशील और साहसिक नेता बनाता है ऐसे ग्रह की दशा /अन्तर्दशा के समय में जातक सक्रिय होता है।। और अपने सम्वन्धित क्षेत्र में सफलता पाता है।।
सूर्य चन्द्र मंगल और लगन से गर्भाधान का विचार किया जाता है वीर्य की अधिकता से पुरुष तथा रक्त की अधिकता से कन्या होती है। रक्त और रज का बरावर होने से नपुंसक का जन्म होता है"।
जन्म से चार वर्ष के भीतर बालक की मृत्यु का कारण माता के कुकर्मों, चार से आठ वर्ष के बीच मृत्यु पिता के पाप कर्मों और आठ से बारह वर्ष की आयु के मध्य मृत्यु स्वयं के पूर्वजन्म के पापों के कारण मानी गई है.
शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म देने की जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है।
राशिचक्र के २७ नक्षत्रों के नौ भाग करके तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक भाग माना गया है। इनमें प्रथम 'जन्म नक्षत्र', दसवाँ 'कर्म नक्षत्र' तथा उन्नीसवाँ 'आधान नक्षत्र' माना गया है। शेष को क्रम से संपत्, विपत्, क्षेम्य, प्रत्वर, साधक, नैधन, मैत्र और परम मैत्र माना गया है। 15)किसी भी प्रकार का रिसाव राहु के अंतर्गत आता है.रिसाव किसी भी चीज का हो सकता है द्रव , शक्ति , धन , मान सम्मान या ओज का.।
बुध के निर्बल होने पर कुंडली में अच्छा शुक्र भी अपना प्रभाव खो देता है क्योंकि शुक्र को लक्ष्मी माना जाता है और विष्णु की निष्क्रियता से लक्ष्मी भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाती हैं.
शनि वचनबद्धता , कार्यबद्धता और समयबद्धता का कारक ग्रह है. जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन तीनो चीजों का अभाव होगा तो समझना चाहिए की उसकी पत्रिका में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है।
नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है. लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है. क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है. जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.। इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.। यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है. फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है. शनि या राहु.??????
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं. यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है. इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है.
लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है."।
व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा"".।