मेरी ब्लॉग सूची : INDIAN ASTROLOGY

सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

नशा मुक्त कैसे हो

 नशा छोड़ने के लिए

चाहे वह कोई भी नशा हो शराब, गुटखा, तम्बाकू या कोई

भी।

अदरक के छोटे छोटे टुकड़े काट ले अब इन पर सेंधा नमक बुरक ले, अब इन

टुकड़ो पर निम्बू निचोड़ ले और इन टुकड़ो को धुप में सूखने के लिए रख दे। जब

सूख जाए तो बस हो गयी दवा तैयार।

अब जब भी किसी नशे की लत लगे

तो ये टुकड़ा निकाला और चूसते रहो। ये अदरक मुह में घुलती

नहीं इसको आप सुबह से शाम तक मुह में रख सकते हैं।

अब आप सोचोगे के ऐसा अदरक में क्या हैं तो सुनिए जब किसी

आदमी को नशे की लत लगती हैं तो

उसकी बॉडी सल्फर की डिमांड

करती हैं, और अगर हम सल्फर की

कमी शरीर में पूरी कर दे तो 

बॉडी को ये नशे की उठने वाली तलब

नहीं लगेगी।

ये प्रयोग आप ३ से ४ दिन करोगे तो ही आप नशा मुक्त हो

जाओगे। अगर कोई बहुत बड़ा नशेबाज हैं या रेगुलर ड्रिंक करते हैं तो उनको ये

७ से ८ दिन लग सकते हैं।

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

वैधव्यता के लक्षण


"पापेSष्टमे तु विधवा निधनाधिपतिर्नवांशके यस्य !
तस्य दशायाम् मरणं वाच्यां तस्याः शुभैर्द्वितीयश्चैः !!"
जिस स्त्री जातक के जन्मकुण्डली में अष्टम भाव में कोई पापीग्रह विद्यमान हो, और उससे कोई पापीग्रह दृष्टि या युति सम्बन्ध भी बना रहा हो, तब उस स्त्री के विधवा होने की प्रबल सम्भावना बन जाती है ! उसकी नवांश कुण्डली में, अष्टमेश जिस ग्रह के नवांश में स्थित होता है, उसी ग्रह की जब महादशा, अन्तरदशा स्त्री के विवाह के पश्चात प्रारम्भ होती है, उसी अवधि में उसे वैधव्यता भी प्राप्त होगी !
. परन्तु यदि स्त्री की कुण्डली में पापी ग्रह अष्टम भाव में स्थित भी हो परन्तु कोई बली शुभ ग्रह द्वितीय भाव में स्थित हो जाय तब वह सुहागिन रहते ही मृत्यु को प्राप्त होगी और उसके पति की मृत्यु उससे बाद ही होगी ! अर्थात तब वह विधवा नहीं होगी !



बुधवार, 16 जून 2021

योनि दोष का विश्लेषण /analysis of vaginal defects

 84 लाख योनियो में 14 योनियाँ सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती हैं । जिंनका निर्धारण मनुष्य के पैदा होने के समय नक्षत्र के अनुसार किया जाता है । 

27 नक्षत्रों के अनुसार 14 योनियाँ होती हैं । 

1- अश्व योनि 

2- गज योनि 

3- मेष योनि 

4- सर्प योनि 

5- श्वान योनि 

6- मार्जार योनि 

7- मूषक योनि 

8- गौ योनि 

9 - महिष योनि 

10 - व्याघ्र  योनि 

11- मृग योनि 

12- वानर योनि 

13- नकुल योनि 

14 - सिंह योनि । 

इन 14 योनियों में कुछ मित्र योनि होती हैं , कुछ शत्रु  योनि होती हैं और कुछ महावैर योनि होती हैं जैसे - 

साँप और नेवला  

हाथी और शेर 

गौ और व्याघ्र 

चूहा और बिल्ली 

घोड़ा और महिष 

वानर और मेष 

ये महावैर योनि हैं । 

इस योनि दोष का परिणाम मुख्यत संभोग के रूप में देखा जाता है । दुनिया में 50 % रिश्ते असंतोषजंनक शारीरिक संबंधों के कारण टूट जाते हैं । इसलिए इस दोष का संबंध असंतोषजनक संबंधों के रूप में देखा जाता है । 

उदाहरण के लिए लड़के की योनि गज है और लड़की की योनि सिंह है , तो ऐसी स्थिति में हाथी और शेर संभोग नहीं कर सकते हैं । ये एक दूसरे को देखते ही मारने की कोशिश करते हैं । इसी प्रकार लड़का और लड़की की कुंडली में यह दोष आ जाता है । तो हम बोल देते हैं इनका शारीरिक संबंध ठीक नहीं रहेगा । योनि दोष का मिलान उचित नहीं है । 

कितनी बार देखने में आता है की पति और पत्नी के बीच हमेशा इसी मुद्दे को लेकर झगड़ा बना रहता है । 

इसलिए शादी से पहले कुंडली मिलान के हर पहलू पर विचार करना चाहिए ।

कुंडली मिलाने से पहले लड़के व लड़की की कुंडली में इन 11 योगों को अवश्य देख लेना चाहिए । 

1- लंबी आयु  

2- चरित्र हीनता  

3- दरिद्र योग 

4- लंबी बीमारी  

5- होमोसेक्स 

6- हिजड़ापन  

7 -तलाक योग  

8 -बांझपन  

9-अवैध संबंध 

10-जेल योग 

नोट -  शनि महादशा , राहू महादशा ,शनि की  साढ़े साती या मांगलिक दोष न हो ।




बुधवार, 9 जून 2021

वास्तु शास्त्र का मानव पर प्रभाव

वास्तुशास्त्र के अनुसार पंचमहाभूतों- पृथ्वी ,जल , वायु , अग्नि और आकाश के विधिवत उपयोग से बने आवास में पंचतत्व से निर्मित प्राणी की क्षमताओं को विकसित करने की शक्ति स्वत: स्फूर्त हो जाती है !

हमारे ग्रंथों के अनुसार—-
“शास्त्रेण सर्वस्य लोकस्य परमं सुखम् ।
चतु:वर्ग फलाप्राप्ति सलोकश्च :भवेत्ध्रुवम ॥
शिल्पशास्त्र परिज्ञान मृत्योअपि सुजेतांव्रजेत् ।
परमानन्द जनक देवानामिद मीरितम् ॥
शिल्पं बिना नहि देवानामिद मीरितम्
शिल्पं बिना नहि जगतेषु लोकेषु विद्यते !
जगत् बिना न शिल्पा च वतंते वासवप्रभोः !!”
वास्तुविद् विश्वकर्मा के अनुसार शास्त्र सम्मत निर्मित भवन विश्व को सम्पूर्ण सुख, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराता है ! वास्तु शिल्पशास्त्र का ज्ञान मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कराकर लोक में परमानन्द उत्पन्न करता है, अतः वास्तु शिल्प ज्ञान के बिना निवास करने का संसार में कोई महत्व नहीं है ! जगत और वास्तु शिल्पज्ञान परस्पर पर्याय हैं !
हमारे ऋषि मनीषियों ने हमारे आसपास की सृष्टि में व्याप्त अनिष्ट शक्तियों से हमारी रक्षा के उद्देश्य से इस विज्ञान का विकास किया ! वास्तु का उद्भव स्थापत्य वेद से हुआ है, जो अथर्ववेद का अंग है ! इस सृष्टि के साथ-साथ मानव शरीर भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है और वास्तु शास्त्र के अनुसार यही तत्व जीवन तथा जगत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं ! भवन निर्माण में भूखण्ड और उसके आसपास के स्थानों का महत्व बहुत अहम होता है !
भूखण्ड की शुभ-अशुभ दशा का अनुमान वास्तुविद् आसपास की चीजों को देखकर ही लगाते हैं ! भूखण्ड की किस दिशा की ओर क्या है और उसका भूखंड पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, इसकी जानकारी वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन विश्लेषण से ही मिल सकती है ! इसके सिद्धांतों के अनुरूप निर्मित भवन में रहने वालों के जीवन के सुखमय होने की संभावना प्रबल हो जाती है ! हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसका घर सुंदर और सुखद हो, जहां सकारात्मक ऊर्जा का वास हो, जहां रहने वालों का जीवन सुखमय हो ! इसके लिए आवश्यक है कि घर वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप हो और यदि उसमें कोई वास्तु दोष हो, तब उसका वास्तुसम्मत सुधार किया जाए ! यदि मकान की दिशाओं में या भूमि में दोष हो तब उस पर कितनी भी लागत लगाकर मकान खड़ा किया जाए, उसमें रहने वालों की जीवन सुखमय नहीं होता ! मुगल कालीन भवनों, मिस्र के पिरामिड आदि के निर्माण-कार्य में वास्तुशास्त्र का सहारा लिया गया है !
वास्तु का प्रभाव चिरस्थायी है, क्योंकि पृथ्वी का यह झुकाव शाश्वत है, ब्रह्माण्ड में ग्रहों आदि की चुम्बकीय शक्तियों के आधारभूत सिध्दांत पर यह निर्भर है और सारे विश्व में व्याप्त है इसलिए वास्तुशास्त्र के नियम भी शाश्वत है, सिध्दांत आधारित, विश्वव्यापी एवं सर्वग्राहा हैं ! किसी भी विज्ञान के लिए अनिवार्य सभी गुण तर्क संगतता, साध्यता, स्थायित्व, सिध्दांत परकता एवं लाभदायकता वास्तु के स्थायी गुण हैं ! अतः वास्तु को हम बेहिचक वास्तु विज्ञान कह सकते हैं !
जैसे आरोग्यशास्त्र के नियमों का विधिवत् पालन करके मनुष्य सदैव स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकता है, उसी प्रकार वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार भवन निर्माण करके प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन को सुखी बना सकता है ! चिकित्साशास्त्र में जैसे डाक्टर असाध्य रोग पीड़ित रोगी को उचित औषधि में एवं आपरेशन द्वारा मरने से बचा लेता है उसी प्रकार रोग, तनाव और अशांति देने वाले पहले के बने मकानों को वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार ठीक करवा लेने पर मनुष्य जीवन में पुनः आरोग्य, शांति और सम्पन्नता प्राप्त कर सकता है !
घर के वास्तु का प्रभाव उसमें रहने वाले सभी सदस्यों पर पड़ता है, चाहे वह मकान मालिक हो या किरायेदार ! आजकल के इस महंगाई के दौर में मकान बनाना एक बहुत बड़ी समस्या है ! लोग जैसे-तैसे जोड़-तोड़ करके अपने रहने के लिए मकान बनाने हेतु भूखंड खरीद लेते हैं ! जल्दबाजी में अथवा सस्ती जमीन के चक्कर में वे बिना किसी शास्त्रीय परीक्षण के भूमि खरीद लेते हैं, और इस तरह खरीदी गई जमीन उनके लिए अशुभ सिद्ध होती है ! उस पर बने मकान में रहने वाले पूरे परिवार का जीवन कष्टमय हो जाता है !
आज फ्लैटों का चलन है ! ये फ्लैट अनिययिमत आकार के भूखंडों पर बने होते हैं। अब एक छोटे से भूखण्ड पर भी एक बोरिंग, एक भूमिगत पानी की टंकी व सेप्टिक टैंक बनाए जाते हैं ! लेकिन ज्ञानाभाव के कारण मकान के इन अंगों का निर्माण अक्सर गलत स्थानों पर हो जाता है ! फलतः संपूर्ण परिवार का जीवन दुखमय हो जाता है !
जनसंख्या के आधिक्य एवं विज्ञान की प्रगति के कारण आज समस्त विश्व में बहुमंजिली इमारतों का निर्माण किया जा रहा है ! जनसामान्य वास्तु सिध्दांतों के विरुध्द बने छोटे-छोटे फ्लेट्स में रहने के लिए बाध्य है ! कहा जाता है कि इन्हें वास्तुशास्त्र के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता !
पर यदि राज्य सरकारें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार कॉलोनी निर्माण करने की ठान ही लें और भूखण्डों को आड़े, तिरछे, तिकाने, छकोने न काटकर सही दिशाओं के अनुरूप वर्गाकार या आयताकार काटें, मार्गों को सीधा निकालें एवं कॉलोनाइजर्स का बाध्य करें कि उन्हें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों का अनुपालन करते हुए ही बहुमंजिली इमारतें तथा अन्य भवन बनाने हैं तो शत-प्रतिशत तो न सही पर साठ प्रतिशत तक तो वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार नगर, कॉलोनी, बस्ती, भवनों, औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्रों तथा अन्य का निर्माण किया जा सकता है जिसके फलस्वरूप जन सामान्य सुख, शांति पूर्ण एवं अरोग्यमय, तनाव रहित जीवन व्यतीत कर सकता है !
मानव सभ्यता के विकास एवं विज्ञान की उन्नति के साथ भवन निर्माण कला में अनेकानेक परिवर्तन होते गये ! पुराने समय में सभी घर लगभग आयताकार होते थे ! घरों में आम तौर पर बोरिंग, पानी की भूमिगत टंकी, सेप्टिक टैंक इत्यादि नहीं होते थे ! जमीन समतल हुआ करती थी। यही कारण था कि तब लोगों का जीवन इस तरह तनावग्रस्त नहीं हुआ करता था !
जनसामान्य वास्तु सिध्दांतों के विरुध्द बने छोटे-छोटे फ्लेट्स में रहने के लिए बाध्य है ! कहा जाता है कि इन्हें वास्तुशास्त्र के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता ! यदि राज्य सरकारें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों के अनुसार कॉलोनी निर्माण करने की ठान ही लें और भूखण्डों को आड़े, तिरछे, तिकाने, छकोने न काटकर सही दिशाओं के अनुरूप वर्गाकार या आयताकार काटें, मार्गों को सीधा निकालें एवं कॉलोनाइजर्स का बाध्य करें कि उन्हें वास्तुशास्त्र के सिध्दांतों का अनुपालन करते हुए ही बहुमंजिली इमारतें तथा अन्य भवन बनाने हैं तब शत-प्रतिशत तो न सही पर साठ प्रतिशत तक तो वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार नगर, कॉलोनी, बस्ती, भवनों, औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्रों तथा अन्य का निर्माण किया जा सकता है जिसके फलस्वरूप जन सामान्य सुख, शांति पूर्ण एवं अरोग्यमय, तनाव रहित जीवन व्यतीत कर सकता है !
वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं क्योंकि दोनों एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं ! जैसे शरीर का अपने विविध अंगों के साथ अटूट संबंध होता है ! ठीक उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र का अपनी सभी शाखायें प्रश्न शास्त्र, अंक शास्त्र, वास्तु शास्त्र आदि के साथ अटूट संबंध है ! ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र के बीच निकटता का कारण यह है कि दोनों का उद्भव वैदिक संहितायों से हुआ है ! दोनों शास्त्रों का लक्ष्य मानव मात्र को प्रगति एवं उन्नति की राह पर अग्रसर कराना है एवं सुरक्षा देना है !
अतः प्रत्येक मनुष्य को वास्तु के अनुसार भवन का निर्माण करना चाहिए एवं ज्योतिषीय उपचार (मंत्र, तंत्र एवं यंत्र के द्वारा) समय-समय पर करते रहना चाहिए, क्योंकि ग्रहों के बदलते चक्र के अनुसार बदल-बदल कर ज्योतिषीय उपचार करना पड़ता है ! वास्तु तीन प्रकार के होते हैं- त्र आवासीय – मकान एवं फ्लैट व्यावसायिक -व्यापारिक एवं औद्योगिक धार्मिक- धर्मशाला, जलाशय एवं धार्मिक संस्थान ! वास्तु में भूमि का विशेष महत्व है ! भूमि चयन करते समय भूमि या मिट्टी की गुणवत्ता का विचार कर लेना चाहिए। !
भूमि परीक्षण के लिये भूखंड के मध्य में भूस्वामी के हाथ के बराबर एक हाथ गहरा, एक हाथ लंबा एवं एक हाथ चौड़ा गड्ढा खोदकर उसमें से मिट्टी निकालने के पश्चात् उसी मिट्टी को पुनः उस गड्ढे में भर देना चाहिए ! ऐसा करने से यदि मिट्टी शेष रहे तब भूमि उत्तम, यदि पूरा भर जाये तब मध्यम और यदि कम पड़ जाये तब अधम अर्थात् हानिप्रद है ! अधम भूमि पर भवन निर्माण नहीं करना चाहिये ! इसी प्रकार पहले के अनुसार नाप से गड्ढा खोद कर उसमें जल भरते हैं, यदि जल उसमें तत्काल शोषित न हो तब उत्तम और यदि तत्काल शोषित हो जाए तब समझें कि भूमि अधम है। भूमि के खुदाई में यदि हड्डी, कोयला इत्यादि मिले तब ऐसे भूमि पर भवन नहीं बनाना चाहिए !
यदि खुदाई में ईंट पत्थर निकले तो ऐसा भूमि लाभ देने वाला होता है ! भूमि का परीक्षण बीज बोकर भी किया जाता है ! जिस भूमि पर वनस्पति समय पर उगता हो और बीज समय पर अंकुरित होता हो तब वैसा भूमि उत्तम है ! जिस भूखण्ड पर थके होकर व्यक्ति को बैठने से शांति मिलती हो तब वह भूमि भवन निर्माण करने योग्य है ! वास्तु शास्त्र में भूमि के आकार पर भी विशेष ध्यान रखने को कहा गया है ! वर्गाकार भूमि सर्वोत्तम, आयताकार भी शुभ होता है ! इसके अतिरिक्त सिंह मुखी एवं गोमुखि भूखंड भी ठीक होता है ! सिंह मुखी व्यावसायिक एवं गोमुखी आवासीय दृष्टि उपयोग के लिए ठीक होता है !
किसी भी भवन में प्राकृतिक शक्तियों का प्रवाह दिशा के अनुसार होता है अतः यदि भवन सही दिशा में बना हो तब उस भवन में रहने वाला व्यक्ति प्राकृतिक शक्तियों का सही लाभ उठा सकेगा, किसकी भाग्य वृद्धि होगी ! किसी भी भवन में कक्षों का दिशाओं के अनुसार स्थान इस प्रकार होता है !
वास्तुशास्त्र को लेकर हर प्रकार से प्रयोग किया जा सकता है ! भूखण्ड एवं भवन के दोषपूर्ण होने पर उसे उचित प्रकार से वास्तुनुसार साध्य बनाया जा सकता है !
जिन घरों के दक्षिण में कुआं पाया गया उन घरों की गृहस्वामिनी का असामयिक निधन आकस्मिक रूप से हो गया तथा घर की बहुएं चिरकालीन बीमारी से पीड़ित मिली ! जिन घरों या औद्योगिक संस्थानों ने नैऋत्य में बोरिंग या कुआं पाया गया वहां निरन्तर धन नाश होता रहा, वे राजा से रंक बन गये, सुख समृध्दि वहां से कोसों दूर रही, औद्योगिक संस्थानों पर ताले पड़ गये ! जिन घरों या संस्थानों के ईशान कोण कटे अथवा भग्न मिले वहां तो संकट ही संकट पाया गया ! यहां तक कि उस गृहस्वामी अथवा उद्योगपति की संतान तक विकलांग पायी गयी ! जिन घरों के ईशान में रसोई पायी गयी उन दम्पत्तियों के यहां कन्याओं को जन्म अधिक मिला या फिर वे गृह कलह से त्रस्त मिले ! जिन घरों में पश्चिम तल नीचा होता है तथा पश्चिमी नैऋत्य में मुख्य द्वार होती है, उनके पुत्र मेधावी होने पर भी निकम्मे तथा उल्टी-सीधी बातों में लिप्त मिले हैं !
वास्तु शास्त्र के आर्षग्रन्थों में बृहत्संहिता के बाद वशिष्ठसंहिता की भी बड़ी मान्यता है तथा दक्षिण भारत के वास्तु शास्त्री इसे ही प्रमुख मानते हैं ! इस संहिता ग्रंथ के अनुसार विशेष वशिष्ठ संहिता के अनुसार अध्ययन कक्ष निवृत्ति से वरुण के मध्य होना चाहिए ! वास्तु मंडल में निऋति एवं वरुण के मध्य दौवारिक एवं सुग्रीव के पद होते हैं। दौवारिक का अर्थ होता है पहरेदार तथा सुग्रीव का अर्थ है सुंदर कंठ वाला ! दौवारिक की प्रकृति चुस्त एवं चौकन्नी होती है ! उसमें आलस्य नहीं होती है ! अतः दौवारिक पद पर अध्ययन कक्ष के निर्माण से विद्यार्थी चुस्त एवं चौकन्ना रहकर अध्ययन कर सकता है तथा क्षेत्र विशेष में सफलता प्राप्त कर सकता है ! पश्चिम एवं र्नैऋत्य कोण के बीच अध्ययन कक्ष के प्रशस्त मानने के पीछे एक कारण यह भी है कि यह क्षेत्र गुरु, बुध एवं चंद्र के प्रभाव क्षेत्र में आता है ! बुध बुद्धि प्रदान करने वाला, गुरु ज्ञान पिपासा को बढ़ाकर विद्या प्रदान करने वाला ग्रह है ! चंद्र मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करता है !
अतः इस स्थान पर विद्याभ्यास करने से निश्चित रूप से सफलता मिलती है !
टोडरमल ने अपने ‘वास्तु सौखयम्’ नामक ग्रंथ में वर्णन किया है कि उत्तर में जलाशय जलकूप या बोरिंग करने से धन वृद्धि कारक तथा ईशान कोण में हो तो संतान वृद्धि कारक होता है ! राजा भोज के समयंत्रण सूत्रधार में जल की स्थापना का वर्णन इस प्रकार किया -
‘पर्जन्यनामा यश्चाय् वृष्टिमानम्बुदाधिप’ !
पर्जन्य के स्थान पर कूप का निर्माण उत्तम होता है, क्योंकि पर्जन्य भी जल के स्वामी हैं ! विश्वकर्मा भगवान ने कहा है कि र्नैऋत्य, दक्षिण, अग्नि और वायव्य कोण को छोड़कर शेष सभी दिशाओं में जलाशय बनाना चाहिये !
तिजोरी हमेशा उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में रहना चाहिए ! इसके अतिरिक्त आग्नेय दक्षिणा, र्नैऋत्य पश्चिम एवं वायव्य कोण में धन का तिजोरी रखने से हानि होता है !
ड्राईंग रूम को हमेशा भवन के उत्तर दिशा की ओर रखना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि उत्तर दिशा के स्वामी ग्रह बुध एवं देवता कुबेर हैं ! वाणी को प्रिय, मधुर एवं संतुलित बनाने में बुध हमारी सहायता करता है ! वाणी यदि मीठी और संतुलित हो तब वह व्यक्ति पर प्रभाव डालती है और दो व्यक्तियों के बीच जुड़ाव पैदा करती है !
र्नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) में वास्तु पुरुष के पैर होते हैं ! अतः इस दिशा में भारी निर्माण कर भवन को मजबूती प्रदान किया जा सकता है, जिससे भवन को नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव से बचाकर सकारात्मक शक्तियों का प्रवेश कराया जा सकता है ! अतः गोदाम (स्टोर) एवं गैरेज का निर्माण र्नैऋत्य कोण में करते हैं ! जिस भूखण्ड का ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तब वैसे भूखण्ड में कार्यालय बनाना शुभ होता है ! वर्गाकार, आयताकार, सिंह मुखी, षट्कोणीय भूखण्ड पर कार्यालय बनाना शुभ होता है ! कार्यालय का द्वार उत्तर दिशा में होने पर अति उत्तम होता है !
पूर्वोत्तर दिशा में अस्पताल बनाना शुभ होता है ! रोगियों का प्रतीक्षालय दक्षिण दिशा में होना चाहिए ! रोगियों को देखने के लिए डॉक्टर का कमरा उत्तर दिशा में होना चाहिए ! डॉक्टर मरीजों की जांच पूर्व या उत्तर दिशा में बैठकर करना चाहिए ! आपातकाल कक्ष की व्यवस्था वायव्य कोण में होना चाहिए। यदि कोई भूखण्ड आयताकार या वर्गाकार न हो तब भवन का निर्माण आयताकार या वर्गाकार जमीन में करके बाकी जमीन को खाली छोड़ दें या फिर उसमें पार्क आदि बना दें !
भवन को वास्तु के नियम से बनाने के साथ-साथ भाग्यवृद्धि एवं सफलता के लिए व्यक्ति को ज्योतिषीय उपचार भी करना चाहिए ! सर्वप्रथम किसी भी घर में श्री यंत्र एवं वास्तु यंत्र का होना अति आवश्यक है ! श्री यंत्र के पूजन से लक्ष्मी का आगमन होता रहता है तथा वास्तु यंत्र के दर्शन एवं पूजन से घर में वास्तु दोष का निवारण होता है !
इसके अतिरिक्त गणपति यंत्र के दर्शन एवं पूजन से सभी प्रकार के विघ्न-बाधा दूर हो जाते हैं ! ज्योतिष एवं वास्तु एक-दूसरे के पूरक हैं ! बिना प्रारंभिक ज्योतिषीय ज्ञान के वास्तु शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता और बिना ‘कर्म’ के इन दोनों के आत्मसात ही नहीं किया जा सकता ! इन दोनों के ज्ञान के बिना भाग्य वृद्धि हेतु किसी भी प्रकार के कोई भी उपाय नहीं किए जा सकते !
वास्तुविद्या मकान को एक शांत, सुसंस्कृत और सुसज्जित घर में तब्दील करती है ! यह घर परिवार के सभी सदस्यों को एक हर्षपूर्ण , संतुलित और समृद्धि जीवन शैली की ओर ले जाता है !
मकान में अपनी ज़रूरत से अधिक अनावश्यक निर्माण और फिर उन फ्लोर या कमरों को उपयोग में न लाना ,बेवजह के सामान से कमरों को ठूंसे रखना भवन के आकाश तत्व को दूषित करता है ! नकारात्मक शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए सुझाव है कि भवन में उतना ही निर्माण करें जितना आवश्यक हो !
भाग्य का निर्माण केवल ज्योतिष और वास्तु से ही नहीं होता, वरन् इनके साथ कर्म का योग होना भी अति आवश्यक है ! इसलिए ज्योतिषीय एवं वास्तुसम्मत ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न दैवीय साधनाओं, वास्तु पूजन एवं ज्योतिष व वास्तु के धार्मिक पहलुओं पर भी विचार करना अत्यंत आवश्यक है ! भाग्यवृद्धि में वास्तु शास्त्र का महत्व वास्तु विद्या बहुत ही प्राचीन विद्या है ! ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान के साथ-साथ वास्तु शास्त्र का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है जितना कि ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान ! विश्व के प्राचीनतम् ग्रंथ ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है ! वास्तु के गृह वास्तु, प्रासाद वास्तु, नगर वास्तु, पुर वास्तु, दुर्गवास्तु आदि अनेक भेद हैं !
भाग्य वृद्धि के लिए वास्तु शास्त्र के नियमों का महत्व भी कम नहीं है ! घर या ऑफिस का वास्तु ठीक न हो तब भाग्य बाधित होता है। वास्तु और भाग्य का जीवन में कितना संयोग है ? क्या वास्तु के द्वारा भाग्य बदलना संभव है ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए यह जानना आवश्यक है कि भाग्य का निर्माण वास्तु से नहीं अपितु कर्म से होता है और वास्तु का जीवन में उपयोग एक कर्म है और इस कर्म की सफलता का आधार वास्तुशास्त्रीय ज्ञान है ! पांच आधारभूत पदार्थों भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश से यह ब्रह्मांड निर्मित है और ये पांचों पदार्थ ही पंच महाभूत कहे जाते हैं ! इन पांचों पदार्थों के प्रभावों को समझकर उनके अनुसार अपने भवनों का निर्माण कर मनुष्य अपने जीवन और कार्यक्षेत्र को अधिक सुखी और सुविधा संपन्न कर सकता है !
वास्तु सिद्धांत के अनुरूप निर्मित भवन एवं उसमें वास्तुसम्मत दिशाओं में सही स्थानों पर रखी गई वस्तुओं के फलस्वरूप उसमें रहने वाले लोगो का जीवन शांतिपूर्ण और सुखमय होता है ! इसलिए उचित यह है कि भवन का निर्माण किसी वास्तुविद से परामर्श लेकर वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप ही करना चाहिए ! इस तरह, मनुष्य के जीवन में वास्तु का महत्व अहम होता है ! इसके अनुरूप भवन निर्माण से उसमें सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है !



शनिवार, 5 जून 2021

सूर्य की उपासना sun worship

 सूर्य आत्माकारक ग्रह है, यह राज्य सुख, सत्ता, ऐश्वर्य, वैभव, अधिकार, आदि प्रदान करता है। यदि सूर्य भगवान प्रसन्न रहें तो आपका जीवन सुखमय एवं मान-सम्मान से भरा रहता है. अपने जीवन में सुख के आगमन हेतु जानिए सूर्यदेव को प्रसन्न करने के उपायों के बारे में -


प्रात:काल सूर्य देव का अर्घ्‍य देने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मनुष्य सफलता पाता है. धन संबंधी परेशानी एवं सभी प्रकार की नकारात्मकता दूर होती है.

सूर्य आदित्यहृदयस्तोत्र का नियमित पाठ करने से जीवन के सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है. यह विशेष फलदायी उपाय है। इसका पाठ करने से शत्रु की पराजय और रोग से छुटकारा मिलता है.

शारीरिक और मानसिक विकारों को दूर करने के लिए नियमित रूप से सूर्य देव को अष्टांग प्रणाम करें.

सूर्य की प्रबल स्थिति के लिए तर्जनी उंगली में माणिक्य अथवा तांबे की अंगूठी धारण करें.

कुण्डली में सूर्य कमज़ोर है तो पिता एवं अन्य बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं.

 सूर्यदेव से अधिक उत्त़म फल पाने हेतु बीज मंत्रों का जाप करें.

गुड़, सोना, तांबा और गेहूं का दान भी सूर्य ग्रह की शांति के लिए उत्तम माना गया है. सूर्य से सम्बन्धित रत्न का दान भी करें । 

बुधवार, 2 जून 2021

भारतीय वास्तुशास्त्र Indian Architecture

 1. मानवोपयोगी विविध शास्त्रों में वास्तुशास्त्र भी एक है,जो ‘वास’ यानी भवननिर्माण के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है ! ‘वसति अस्मिन् इति वास्तु’— गृह, भवन, प्रासाद, दुर्ग, मन्दिर, नगर, ग्राम, विविध उद्योग और व्यापार केन्द्र, यह सभी वास्तु के अन्तर्गत आते हैं ! कूप, तड़ाग, वापी, यज्ञशाला, पर्णकुटी, गोशाला आदि भी इसी के ही अंग हैंं ! चित्रकला, मूर्तिकला, काष्ठकला, अन्यान्य शिल्पादि भी वास्तुशास्त्र के अन्तर्गत ही हैं ! वस्तुतः वास्तुकर्म शिल्पकर्म का ही पर्याय है !

2. वास्तु कोई नवीन विषय नहीं है ! विश्वकर्मा ने समस्त विश्व को ही वास्तु के रुप में प्रतिपादित किया है ! तदनुसार अखिल ब्रह्माण्ड ही वास्तुशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय बन जाता है ! प्राग्वैदिक काल से लेकर, पौराणिक और अत्याधुनिक काल तक इसकी विशद चर्चा चली आ रही है ! 

३. वास्तुशास्त्र में अठारह प्रवर्तक आचार्यों का उल्लेख मिलता है —

भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विशालाक्ष, पुरन्दर, ब्रह्मा कुमार, नन्दश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, बृहस्पति और शुक्राचार्य !

4. वास्तु के देवता को वास्तोष्पति कहा जाता है ! इनकी उत्पत्ति शिव के स्वेद से मानी गयी है !

!

5. स्थिर स्थिति में, वास्तुमण्डल में  ईशानकोण पर अधोमुख, सुप्तावस्था में इनकी अवस्थिति कही गयी है, जिनका सिर ईशान में, तदनुसार मुड़े हुए पैर नैर्ऋत्य में हैं ! इनके मुंह से सदा तथास्तु शब्दघोष होते रहता है !

6. भवननिर्माणादि क्रम में दिये जाने वाले पिण्ड-पूजनादि से ही वास्तुदेव का पोषण होता है,और इनके आशीष से गृहादि का रक्षण होता है !

7. वास्तुदेवता की चरावस्था क्रमशः विपरीत दिशा में, तीन-तीन माह की होती है !

8. वास्तुदेव के चैतन्य और व्यावहारिक स्वरुप को ही विश्वकर्मा कहा जाता है ! इनका ही दूसरा नाम देवशिल्पी है ! दैत्यशिल्पी का कार्य करने पर इन्हें ही मयदानव के रुप में भी जाना जाता है ! मय एक जातिवेशेष का भी नाम है,जो असुरों में ख्यात है, और शिल्पकार्य में निपुण है, किंचित मतभेद से इन दोनों को अलग-अलग भी मान्यता है,और वास्तुशास्त्र के दो आदि आचार्यों के रुप में प्रतिष्ठा प्राप्त है !

9. वास्तुशास्त्र सिर्फ सामान्य शिल्पशास्त्र भर ही नहीं है,बल्कि इसके गहन ज्ञान के लिए ज्योतिष,तन्त्र आदि का भी ज्ञान रखना अति आवश्यक है !

10. वास्तुशास्त्र हमें प्राकृतिक शक्तियों का सही उपयोग  कर, सुखमय जीवन जीने की कला सिखाता है !



रविवार, 30 मई 2021

क्या आपकी कुण्डली में दुर्घटना योग है ? Is there an accident in your horoscope?

 भारतीय ज्योतिष में  सारावली ग्रन्थ के अनुसार शनि, चंद्रमा और मंगल दूसरे, चतुर्थ व दसवें भाव में होने पर वाहन से गिरने पर दुर्गम  दुर्घटना देते हैं. जन्म कुंडली में सूर्य तथा मंगल चतुर्थ भाव में पापी ग्रहों से दृष्ट होने पर दुर्घटना के योग बनते हैं।

 जन्म कुंडली के त्रिक भाव सबसे अशुभ समझे जाते हैं और इनके भावेशों को भी अशुभ ही समझा जाता है.-

 1--आठवें भाव तथा अष्टमेश की भूमिका भी आती है.l

2--जन्म कुंडली में राहु,केतु, शनि व मंगल को भी देखा जाता है.l

3-- मंगल को चोट लगने का कारक माना ही जाता हैl

यदि वाहन से दुर्घटना के योग देखने हों तब शुक्र, चतुर्थ भाव तथा चतुर्थेश का विश्लेषण किया जाता है.--

1--यदि कोई दो पापी ग्रह परस्पर षडाष्टक योग में स्थित हैं तब उनकी स्थिति अशुभ समझी जाती हैl

.2--परस्पर षडाष्टक स्थिति में बैठे ग्रह की दशा चलने पर यदि गोचर भी प्रतिकूल ही चल रहा हो तब दुर्घटना होने की संभावना ज्यादा बनती है.l

 विशेष--- दुर्घटनाओं को जन्म कुंडली के साथ वर्ग कुंडलियो में भी देखा जाना चाहिए और तब किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाना चाहिए. यदि दोनो में ही दुर्घटना के योग बनते हैं तभी दुर्घटना होगी अन्यथा कम में ही बात टल जाएगी.l

जन्म कुंडली में आठवाँ भाव अथवा अष्टमेश, मंगल तथा राहु से पीड़ित होने पर दुर्घटना होने के योग बनते हैंl

 1---सारावली के अनुसार शनि, चंद्रमा और मंगल दूसरे, चतुर्थ व दसवें भाव में होने पर वाहन से गिरने पर बुरी दुर्घटना देते हैंl

2--जन्म कुंडली में सूर्य तथा मंगल चतुर्थ भाव में पापी ग्रहों से दृष्ट होने पर दुर्घटना के योग बनते हैंl

.3--सूर्य दसवें भाव में और चतुर्थ भाव से मंगल की दृष्टि पड़ रही हो तब दुर्घटना होने के योग बनते हैंl

4--निर्बली लग्नेश और अष्टमेश की चतुर्थ भाव में युति हो रही हो तब वाहन से दुर्घटना होने की संभावना बनती हैl

.5--लग्नेश कमजोर हो और षष्ठेश, अष्टमेश व मंगल के साथ हो तब गंभीर दुर्घटना के योग बनते हैं.l

6--जन्म कुंडली में लग्नेश कमजोर होकर अष्टमेश के साथ छठे भाव में राहु, केतु या शनि के साथ स्थित होता है तब गंभीर रुप से दुर्घटनाग्रस्त होने के योग बनते हैंl

7--जन्म कुंडली में आत्मकारक ग्रह पापी ग्रहों की युति में हो या पापकर्तरी में हो तब दुर्घटना होने की संभावना बनती हैl

8--,जन्म कुंडली का अष्टमेश सर्प द्रेष्काण में स्थित होने पर वाहन से दुर्घटना के योग बनते हैंl

9--जन्म कुंडली में यदि सूर्य तथा बृहस्पति पीड़ित अवस्था में स्थित हों और इन दोनो का ही संबंध त्रिक भाव के स्वामियों से बन रहा हो तब वाहन दुर्घटना अथवा हवाई दुर्घटना होने की संभावना बनती हैl

10--जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव तथा दशम भाव पीड़ित होने से व्यक्ति की गंभीर रुप से दुर्घटना होने की संभावना बनती हैl

 घाव तथा चोट लगने के योग ---

1--यह मंगल की पीड़ित अवस्था के कारण होने की संभावना अधिक रहती है.l

 2--जन्म कुंडली में यदि मंगल लग्न में हो और षष्ठेश भी लग्न में ही स्थित हो तब शरीर पर चोटादि लगने की संभावना अधिक होती हैl

3---जन्म कुंडली में मंगल पापी होकर आठवें या बारहवें भाव में स्थित होने पर चोट लगने की संभावना बनती हैl

4--जन्म कुंडली में यदि मंगल, शनि और राहु की युति हो रही हो तब भी चोट अथवा घाव होने की संभावना बनती हैl

5--चंद्रमा दूसरे भाव में हो, मंगल चतुर्थ भाव में हो और सूर्य दसवें भाव में स्थित हो तब चोट लगने की संभावना बनती हैl

6--जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो, आठवें भाव में शनि स्थित हो और दसवें भाव में चंद्रमा स्थित हो तब चोट लगने की अथवा घाव होने की संभावना बनती हैl

7---जन्म कुंडली के छठे भाव में मंगल तथा चंद्रमा की युति हो तब भी चोट लगने की संभावना बनती हैl

8--चंद्रमा तथा सूर्य जन्म कुंडली के तीसरे भाव में होने से भी चोट लगने की संभावना बनती हैl

 9--कुंडली का लग्नेश तथा अष्टमेश शनि और राहु या केतु के साथ आठवें भाव में स्थित हो तब भी चोट लगने की संभावना बनती हैl

10--लग्नेश, चतुर्थेश तथा अष्टमेश की युति होने पर भी चोट लगने की संभावना बनती हैl

11--जन्म कुंडली के लग्न में ही छठे भाव का स्वामी राहु या केतु के साथ स्थित होl

12--जन्म कुंडली के छठे अथवा बारहवें स्थान में शनि व मंगल की युति हो रही होl

13--जन्म कुंडली के लग्न में पाप ग्रह हो या लग्नेश की पापी ग्रह से युति हो और मंगल दृष्ट कर रहा हो l




बुधवार, 19 मई 2021

महामृत्युञ्जय महामंत्र के विशेष प्रयोग - pecial uses of Mahamrityunjaya Mahamantra

  ॐ  हौं जूं : स:  त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ! उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्  स:जूं हौं ॐ  !!

महामृत्युञ्जय महा  मंत्र का सीधा अर्थ है मृत्यु पर भी विजय करने वाला महामंत्र !महामृत्युञ्जय महामंत्र भगवान रूद्र का एक सर्वशक्तिशाली और साक्षात् प्रभाव देने वाला सिद्ध महा मंत्र है और अधिकांशतः लोग इससे परिचित भी हैं ही, समान्यतया अच्छे स्वास्थ के लिए, असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए और अकाल मृत्यु-भय से रक्षा के लिए महामृत्युंजय महा  मंत्र का  जाप किया जाता है या *कर्मकाण्डी ब्राह्मण* से इसका अनुष्ठान कराया जाता है पर महामृत्युञ्जय महा  मंत्र का प्रयोग न केवल अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए बल्कि आपके जीवन की और भी बहुत सी बाधाओं से मुक्ति देने में महामृत्युञ्जय महा  मंत्र का जाप अपना चमत्कारिक प्रभाव दिखाता है !

1 - यदि आपका स्वास्थ समान्य से अधिक और हमेशा ही खराब रहता है, तो नित्य महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप करें ,अवश्य लाभ होगा !

2 - बीमारी या रोगों के कारण जब जीवन संकट वाली स्थिति आ जाए तो महामृत्युञ्जय महा  मंत्र का जाप करें या वैदिक ब्राह्मण से अनुष्ठान कराएं !

3 - जिन लोगों के साथ बार बार एक्सीडेंट्स की स्थिति बनती रहती हो ऐसे लोगो को महामृत्युंजय मंत्र का नित्य जाप करना बहुत सकारात्मक परिवर्तन लाता है !

4 - जिन लोगों को डर भय और फोबिया की समस्या हो ऐसे लोगों को महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप करना बहुत शुभ परिणाम देता है !

5 - एक सफेद कागज पर लाल पेन से महामृत्युंजय मंत्र लिखें एक दिन के लिए अपने पूजास्थल पर रखें और फिर हमेशा वाहन चलाते समय इसे अपने ऊपर वाले जेब में रखें दुर्घटनाओं से हमेशा आपकी रक्षा होगी !

6 - जिन लोगों की जन्म कुण्डली में कालसर्प योग होने से जीवन में संघर्ष रहता हो उनके लिए महामृत्युंजय महा मंत्र का जाप अमृत-तुल्य होता है !

7 - कुण्डली में चंद्रमा पीड़ित या कमजोर होने पर उत्पन्न होने वाली मानसिक समस्याओं में भी महामृत्युञ्जय महा  मंत्र का जाप बहुत शुभ परिणाम देता है ! 

8 - महामृत्युञ्जय मंत्र की ध्वनि से घर से सभी *"नकारात्मक"* ऊर्जाएं दूर रहती हैं !




सोमवार, 17 मई 2021

क्यों आये भगवान शिव महाकाली के पैरों के नीचे? Why Lord Shiva came under the feet of Mahakali?

 भगवती दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली। जिनके काले और डरावने रूप की उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एक मात्र ऐसी शक्ति हैं जिन से स्वयं काल भी भय खाता है। 

उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है की संपूर्ण संसार की शक्तियां मिल कर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आ कर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा वर्णित हैं जो इस प्रकार है-

दैत्य रक्तबिज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था की अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उस से अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया।

 देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबिज का नाश करने को तत्पर थे मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद खून धरती पर गिरती उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते।

सभी देवता मिल कर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप हैं, जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए ही हुई थी।

 महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमी में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है की वह विकराल मां हैं। 

जिसके हाथ में खप्पर है,लहू टपकता है तो गले में खोपड़ीयों की माला है मगर मां की आंखे और ह्रदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।

महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उस से अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्ध भूमी में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तर किया। 

दानवों का एक बूंद खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। वह लाशों के ढेर लगाती गई और उनका खून पीने लगी। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विक्राल रूप से चुका था की उनको शांत करना जरुरी था मगर हर कोई उनके समीप जाने से भी डर रहा था

सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान् शिव ने उन्हें बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश करी जब सभी प्रयास विफल हो गए तो वह उनके मार्ग में लेट गए। 

जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो वह एकदम से ठिठक गई। उनका क्रोध शांत हो गया। आदि शक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मारकण्डेय पुराण में वर्णित है





बुधवार, 12 मई 2021

बुध के अशुभ होने के संकेत एवं उपाय -Signs and remedies of Mercury being inauspicious


व्यक्ति की विवेक शक्ति मे कमी जाती है ,वह अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ होता है ।
सूँघने की शक्तिकमी जाती है।त्वचा के संक्रमण रोग होते हैं।
धन का अपव्यय होता है ।
शिक्षा में कमी आती है ।
बुद्धि और बोली को प्रभावित करता है।
अपनी बहन अथवा बेटी को कष्ट देने एवं बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को कष्ट देने से बुध अशुभ फल देता है।
इसी के साथ हिजड़े को कष्ट देने पर भी बुध अशुभ फल देता है।
शरीर में फोड़े-फुंसियों का होना, समय पर मित्रों का साथ छूटना, कार्यों में लगातार विघ्न आना, पित्त से संबंधित रोग जैसी समस्याएं हों तो ऐसे जातक का बुध कमजोर होना है।
बुध ग्रह से पीड़ित होने पर मस्तिष्क विकार, वाणी दोष, स्मृतिह्रास । अपामार्ग की जड़ धारण करना । "ॐ बुं बुधाय: नम:" मंत्र का नियमित जप करना ।
घर में जमे कचरे को हटाएं गंध का पता न लगे।
सामने के दांत गिरने लगे यह बुध का खराब प्रभाव हो रहा है।
बुध के उपाय -
बुधवार के दिन शुभ मुहूर्त में बुध से संबंधित उपाय
बुधवार का उपवास करें |
उबले हुए मूंग गरीब व्यक्ति को खिलाएं |
गणेशजी की अभ्यर्थना दूर्वा से करें |
हरे वस्त्र, मूंग की दाल का दान बुधवार।
अपने वजन के बराबर हरी घांस गायों को खिलाएं|
बहिन व बेटियों का सम्मान करें|
बुध के उपाय :बिजनेस बढ़ाने :बुध खराब होने से व्यापारियों का दिया या लिया धन मिलता नही है।
गायों को पालक खिलाने से रूका हुआ धन फिर से प्राप्त होनी लगता है।
छत पर जमा कचरा ऋण को बढ़ाता है।
इसे हटाने से ऋण कम होता है।व्यापार ठीक चलता है।ऊँ बुं बुधाय नम: मंत्र का जप करें.
बुधवार के दिन गणेश जी को बूंदी के लड्डू चढ़ायें.
बुधवार को गाय को हरा चारा खिलायें.
कांसे का कड़ा पहनें.ऊँ गं गणपतये नम: का जप करें.
हर बुधवार गाय को हरी घास खिलाएं।
किन्नरों को हरे वस्त्र और हरी चूड़ीयांका दान ।
मन्दिर में कांसे का बर्र्तनका दान।
गणेश मन्दिर में कांसे का दीपक लगाए औरका दान।
10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं को भोजन कराए।
मांस का सेवन नहीं करना चाहिए।
कच्ची मिट्टी की सौ गोलियां बनाकर एक गोली प्रतिदिन धर्म स्थल में पहुंचानी चाहिएं।
खांड से भरा मिट्टी का बर्तन भूमि में दबाना चाहिए।
कान में स्वर्ण धारण करें।



मंगलवार, 4 मई 2021

किस कामना के लिए क्या प्रदार्थ एवं कौनसा फूल शिव को चढ़ाएं -



👉 वाहन सुख के लिए चमेली का फूल।
👉 दौलतमंद बनने के लिए कमल का फूल, शंखपुष्पी या बिल्वपत्र।
👉 विवाह में समस्या दूर करने के लिए बेला के फूल। इससे योग्य वर-वधू मिलते हैं।
👉 पुत्र प्राप्ति के लिए धतुरे का लाल फूल वाला धतूरा शिव को चढ़ाएं। यह न मिलने पर सामान्य धतूरा ही चढ़ाएं।
👉 मानसिक तनाव दूर करने के लिए शिव को शेफालिका के फूल चढ़ाएं।
👉 जूही के फूल को अर्पित करने से अपार अन्न-धन की कमी नहीं होती।
👉 अगस्त्य के फूल से शिव पूजा करने पर पद, सम्मान मिलता है।
👉 शिव पूजा में कनेर के फूलों के अर्पण से वस्त्र-आभूषण की इच्छा पूरी होती है।
👉 लंबी आयु के लिए दुर्वाओं से शिव पूजन करें।
👉सुख-शांति और मोक्ष के लिए महादेव की सफेद कमल के फूलों से पूजा करें।
इसी तरह भगवान शिव की प्रसन्नता से मनोरथ पूरे करने के लिए शिव पूजा में कई तरह के अनाज चढ़ाने का महत्व बताया गया है। इसलिए श्रद्धा और आस्था के साथ इस उपाय को भी करना न चूकें। जानिए किस अन्न के चढ़ावे से कैसी कामना पूरी होती है -
👉 शिव पूजा में गेहूं से बने व्यंजन चढ़ाने पर कुंटुब की वृद्धि होती है।
👉 मूंग से शिव पूजा करने पर हर सुख और ऐश्वर्य मिलता है।
👉 चने की दाल अर्पित करने पर श्रेष्ठ जीवन साथी मिलता है।
👉 कच्चे चावल अर्पित करने पर कलह से मुक्ति और शांति मिलती है।
👉तिलों से शिवजी पूजा और हवन में एक लाख आहुतियां करने से हर पाप का अंत हो जाता है।
👉 उड़द चढ़ाने से ग्रहदोष और खासतौर पर शनि पीड़ा शांति होती है।
इसी तरह भगवान शिव की प्रसन्नता से मनोरथ पूरे करने के लिए शिव पूजा में कई तरह के अनाज चढ़ाने का महत्व बताया गया है। इसलिए श्रद्धा और आस्था के साथ इस उपाय को भी करना न चूकें। जानिए किस अन्न के चढ़ावे से कैसी कामना पूरी होती है -
👉 शिव पूजा में गेहूं से बने व्यंजन चढ़ाने पर कुंटुब की वृद्धि होती है।
👉 मूंग से शिव पूजा करने पर हर सुख और ऐश्वर्य मिलता है।
👉 चने की दाल अर्पित करने पर श्रेष्ठ जीवन साथी मिलता है।
👉 कच्चे चावल अर्पित करने पर कलह से मुक्ति और शांति मिलती है।
👉 तिलों से शिवजी पूजा और हवन में एक लाख आहुतियां करने से हर पाप का अंत हो जाता है।
👉 उड़द चढ़ाने से ग्रहदोष और खासतौर पर शनि पीड़ा शांति होती है।