"पापेSष्टमे तु विधवा निधनाधिपतिर्नवांशके यस्य !
तस्य दशायाम् मरणं वाच्यां तस्याः शुभैर्द्वितीयश्चैः !!"
जिस स्त्री जातक के जन्मकुण्डली में अष्टम भाव में कोई पापीग्रह विद्यमान हो, और उससे कोई पापीग्रह दृष्टि या युति सम्बन्ध भी बना रहा हो, तब उस स्त्री के विधवा होने की प्रबल सम्भावना बन जाती है ! उसकी नवांश कुण्डली में, अष्टमेश जिस ग्रह के नवांश में स्थित होता है, उसी ग्रह की जब महादशा, अन्तरदशा स्त्री के विवाह के पश्चात प्रारम्भ होती है, उसी अवधि में उसे वैधव्यता भी प्राप्त होगी !
. परन्तु यदि स्त्री की कुण्डली में पापी ग्रह अष्टम भाव में स्थित भी हो परन्तु कोई बली शुभ ग्रह द्वितीय भाव में स्थित हो जाय तब वह सुहागिन रहते ही मृत्यु को प्राप्त होगी और उसके पति की मृत्यु उससे बाद ही होगी ! अर्थात तब वह विधवा नहीं होगी !
